पिछले हफ्ते मैंने बिना किसी पास के, आम दर्शकों जैसा स्टेडियम जाकर आईपीएल का एक मैच (डेल्ही डेअरडेविल्स और राजथान रौयाल्स) देखने की योजना बनाई. पहल तो मैं एक-डेढ़ घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद स्टेडियम के गेट तक पहुँच पाया. उससे पहले गाडी को पार्क करने में जो मुश्किल हुई वो अलग.
जब सुनता हूँ की आईपीएल ७०००-८००० की घरेलू लीग है...इसकी ये खूबियाँ हैं...इससे वो फायदा होगा तो ये भी लगता है... कि आम जनता का और कितना चूसा जायेगा...
४४ दिन के आईपीएल टूर्नामेंट में अब ये तय हो गया है कि जिस दिन भी मैच होगा...आम जनता, जो स्टेडियम जाकर मैच नही देखना चाहती, स्टेडियम के आस-पास से भी गुजरती हैं तो उनकी खैर नही. पिछले हफ्ते मैच देखने की वीरता करने के दौरान कम से कम दो-तीन ऐसे लोगों से मिला जो अस्पताल पहुँचने की जद्दोजहद में जुटे रहे ...लेकिन स्टेडियम जाने वालों की भीड़ उन्हें रास्ता नही दे पायी. दरअसल दोष उनका भी नही. उन्होंने टिकट के लिए पैसे खर्चे थे. इनमे से एक रोगी के परिवार से मेरी बात हुई और उनकी बेबसी देखकर गुस्से के अलावा और कुछ नही किया जा सकता था.
इन सबका उपाय है...अगर बीसीसीआई करना चाहे तो.....मेरे ख़याल से मैचों के लिए अब सभी स्टेडियम को शहर के बाहर बनाया जाना चाहिए..और स्टेडियम तक पहुँचने के लिए लक्ज़री बसें बनायी जानी चाहिए. इससे बीसीसीआई की कमाई का एक और जरिया तो बढेगा ही, आम लोगों को कोई तकलीफ नही होगी...यही नही ब्लैक टिकट और सुरक्षा को लेकर होने वाली समस्याएँ कम से कम हो जायेंगी. ऐसा कब होगा...सरकार कब मैच देखना छोड़कर इन छोटी लगानेवाली बड़ी मुश्किलों की और मुखातिब होगी, ये बड़े सवाल हैं
दरअसल बीसीसीआई अभी खेल और खेलप्रेमियों को सिर्फ़ चूसने का काम कर रही है. ....लेकिन एक कहावत है नीम्बू को इतना मत निचोरो की स्वाद कड़वा हो जाए...
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