Saturday, July 19, 2008

वेताल के सवाल

वेताल के सवाल
विमल मोहन
नई दिल्ली, शनिवार, जुलाई 12, 2008

धुन का पक्का विक्रम पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा, उसे कंधे पर डाल लिया और यथावत श्मशान की ओर बढ़ने लगा, तब शव के अन्दर के वेताल (मीडिया) ने विक्रम (रिपोर्टर) से पूछा, 'राजन मैं ये नही जानता कि किस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए तुम इस केस पर इतनी मेहनत कर रहे हो, राजेश तलवार तो जेल से रिहा हो चुके हैं, इसलिए देश की महंगाई पर भी काबू पा ही लिया गया होगा, वैसे भी समस्याओं से भरे इस देश में एक समस्या कम या ज़्यादा हो तो क्या फर्क पड़ता है। वेताल ने कहा कि अगर इन सवालों का जवाब जानते हुए भी तुम जवाब नही दोगे तो तुम्हारी टीआरपी गिरा दी जाएगी तुम्हारे सर के ख़ुद ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।

आपको नहीं लगता बचपन में, चंदामामा में पढ़ी गईं ऐसी तमाम कहानियाँ आज तमाम खबरिया चैनलों की फितरत बन गई हैं। सवाल सिर्फ़ समाज के या ख़बर प्रति संजीदगी या मानवता का ही नही है। क्या आरुषि हत्याकांड, निठारी हत्याकांड या ऐसी ही कई और दूसरी खबरों की बाल की खाल निकालने से टीवी रखे जाने वाले ड्रॉइंग रूम का माहौल बोझिल नही हो गया है? इस बीच मीडिया ने सबसे पहला स्थान हासिल करने की दौड़ में क्या कुछ खो भी दिया है, ये बहुत चिंतन का विषय है।

बचपन में माएं बच्चों को पुलिस से डराती थीं, और बड़े होकर हम दोस्तों में बात होती रही की पुलिस की ना दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी। यकीन मानिए मीडिया की हालत आज इससे बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं है। नूपुर और दुर्रानी परिवार ने जो बात मीडिया के सामने चीख-चीख कर कही (उसे गैर-ज़िम्मेदार बताया), आम लोग इससे बहुत अलग राय नहीं रखते।

राजेश तलवार जेल से रिहा होने के बाद साईं बाबा के मन्दिर पूजा करने जा रहे थे। साथ ही तस्वीरों में ये भी दिखा की एक पिता अपने दो बच्चों को कैमरों से बचाने की कोशिश कर रहा है। मैं हैरान हूं ये सोचकर की क्या मीडिया की हालत इतनी ख़राब हो गई है? क्या मीडिया पर आम लोगों के विश्वास का स्तर यहाँ तक पहुँच गया है? भारत में चौथे स्तम्भ के लिए ये अब एक ऐसा सुलगता सवाल है जो उसकी नियति भी तय करेगा?

मीडिया ये भूल गया है की वो पहरेदार भर की भूमिका निभा सकता है, न्यायलय की नहीं, वो भूल गया है की उसका दायित्व दर्पण बनकर झूठ और सच के सामने खड़े होने भर का है ताकि समाज उसके हिसाब से अपनी राय बना सके। मीडियाकर्मी या संस्थाएं आगे निकलने की आपाधापी में घटनाओं में सच और झूठ के रंग भरने की कोशिश करते हैं और इस क्रम में अपनी विश्वसनीयता खोकर समाज में इसे अस्पृश्य का दर्जा हासिल करते जा रहे हैं।

'आरुषि-मर्डर केस' का सच चाहे जो भी हो आम लोगों में इस बात की राहत ज़्यादा दिख रही है की चलो इस न्यूज़ से शायद अब छुटकारा मिला। इस देश में जहाँ चुनाव, महंगाई, सरकार बचने-गिरने की कवायद किसी तरह चैनल और अखबारों में जगह बना पाते हों (जिसका हम सबकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ने वाला है), ज़ाहिर है लोग ख़बरों की बजाय सास-बहू और राखी सावंत के टॉक-शो देखना ज़्यादा पसंद करेंगे।

मीडिया क्या बेचना या परोसना चाहती है, ये सब ज्यादातर मीडिया के एयर-कंडीशंड कमरों में तय हो जाते हैं, क्योंकि बुनियादी तौर पर रिपोर्टिंग का स्तर गिर रहा है। रिपोर्टर मैदान पर जाकर हकीकत जानने के बजाय फ़ोन पर रिपोर्टिंग की ख़बर बटोरते हैं, स्टोरी फाइल करते हैं और दिहाड़ी पूरी हो जाती है। इसलिए, किस रिपोर्टर की कितनी बड़ी शख्सियत से जान पहचान है ये मीडियाकर्मियों के बीच बातचीत का अहम् मुद्दा होता है। बुनियादी स्तर पर किस रिपोर्टर को विषयों की कितनी समझ है इसकी ज़रूरत कभी-कभी ही समझी जाती है, लेकिन वक्त आ गया है ओपिनियन-मेकर माना जाने वाला मीडिया आत्ममंथन शुरू कर दे वरना जिस समाज के सामने अपनी खबरें बेचकर वो जीविका चलाते हैं उस समाज से दरकिनार कर दिए जाएंगे।

जर्मन चिन्तक-नाटककार और कवि बेर्टोल्ट ब्रेख्त ने ये कविता 1940 के दशक में लिखी थी जिसका उन्वान था 'हॉलीवुड' जो आज भारतीय मीडिया के लिए बहुत सटीक बैठती है:

रोज़ाना रोटी कमाने की खातिर
मैं बाज़ार जाता हूं
जहाँ झूठ खरीदे जाते हैं
उम्मीद के साथ
मैं विक्रेताओं के बीच अपनी जगह बना लेता हूं ...

निशाना राठौर की लीग में...

निशाना राठौर की लीग में...
विमल मोहन
नई दिल्ली, बुधवार, जुलाई 9, 2008

आज आप किसी भी भारतीय खेलप्रेमी से अगर सवाल करें कि इस बार बीजिंग ओलम्पिक में कौन भारतीय पदक जीत सकता है... शायद ज्यादातर लोग राज्यवर्धन राठौर के नाम के साथ जाना चाहेंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं, भारत सहित दुनिया-भर के निशानेबाजों के सर्किट में एक और भारतीय नाम को बड़े अदब से लिया जाने लगा है - वह है दिल्ली के डबल ट्रैप शूटर रोंजन सोढी का।

यूं तो रोंजन पिछले दो साल से कमाल का निशाना साध रहे हैं, लेकिन पिछला महीना उनके लिए लाजवाब साबित हुआ। बेलग्रेड में हुए वर्ल्ड कप में उन्होंने न सिर्फ़ अपने रोल मॉडल राज्यवर्धन राठौर को पछाड़ा, बल्कि डबल ट्रैप में दो वर्ल्ड रिकॉर्ड भी कायम किए। रोंजन ने क्वालिफाइंग में 147/150 और फाइनल में 194/200 का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर दुनिया-भर के निशानेबाजों को हैरान कर दिया। ओलम्पियन मनशेर सिंह भी रोंजन की तारीफ़ के पुल बांधते नही थकते, और कहते हैं, राठौर ने ओलम्पिक पदक जीतकर भारतीय शूटिंग को एक अलग पायदान पर पहुंचाया था, अब रोंजन इसे एक स्तर ऊपर ले गए हैं, क्योंकि इससे पहले क्ले-शूटिंग में भारतीय निशानेबाजों ने पदक तो जीते हैं, लेकिन वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का कारनामा पहली बार हुआ है।

रोंजन ने वर्ल्ड कप में पहली बार स्वर्ण पदक जीता है. उनकी खुशी इसलिए भी चौगुनी हो गई है, क्योंकि उन्होंने प्रतियोगिता में करीब एक दशक पहले रिकॉर्ड कायम करने वाले इटली के डैनिएल डि स्पिंगो, 2000 सिडनी ओलम्पिक के स्वर्ण पदक विजेता रिचर्ड फॉल्ड्स और राठौर जैसे दिग्गजों के दिल पर अपना सिक्का चला दिया। जीत के बाद राठौर और स्पिंगो जैसे दिग्गजों की शाबाशी जीतना रोंजन के लिए अपने आप में किसी पदक से कम नहीं है।

रोंजन को मलाल है तो इस बात का, कि वह इस बार अब तक बीजिंग ओलम्पिक के लिए कोटा स्थान हासिल नहीं कर पाए हैं, लेकिन उनकी इस जीत के बाद से भारतीय शूटिंग संघ और भारतीय ओलम्पिक संघ ज़ोर-शोर से उनके लिए लॉबिन्ग कर रहा है, ताकि उन्हें बीजिंग के लिए हार्डशिप कोटा मिल जाए। इन्हें लगता है, अगर रोंजन को राठौर के साथ डबल ट्रैप में ओलम्पिक में उतरने का मौका मिला तो भारत के पदक जीतने की उम्मीद बढ़ जाएंगी। ख़ुद रोंजन को लगता है कि उन्हें बीजिंग में अपनी गन को आजमाने का मौका मिल जाएगा। वह कहते हैं, एशिया में इस बार सिर्फ़ चार एशियाई खिलाड़ियों को कोटा मिला है - एथेंस के स्वर्ण पदक विजेता सऊदी अरब के अहमद अल मख्तूम और रजत पदक विजेता राज्यवर्धन राठौर, चीन के हु बिनयुआन और पैन किआंग को - जबकि यूरोप से आठ खिलाड़ियों ने कोटा स्थान हासिल किया है।

इसीलिए रोंजन को पूरा भरोसा है कि इस महीने के तीसरे हफ्ते के शुरू होने से पहले वह भी कोटा स्थान हासिल कर लेंगे और राठौर की लीग में आकर निशाना लगाएंगे। अचानक ओलम्पिक प्रतियोगिता में उतरकर निशाना न साधना पड़े, इसलिए अभ्यास के लिए वह ऑस्ट्रेलिया का रुख कर चुके हैं, जहां वह राठौर के पूर्व कोच रसेल मार्क के साथ कोचिंग कर रहे हैं।

दरअसल राठौर और रोंजन में इस वक्त कई समानताएं दिख रही हैं। एथेंस के पदक से पहले राठौर भी इसी तरह लाजवाब फॉर्म में थे, उन्होंने भी पहले निकोसिया में वर्ल्ड चैम्पियनशिप का पदक जीतने का कारनामा किया था और कोच रसेल मार्क ने उन्हें भी कामयाबी के गुर बताए थे। ये सभी संकेत भारतीय शूटिंग के चमकते भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं।

भारतीय मीडिया भले ही रोंजन के नाम को खास तवज्जो नहीं दे रहा हो, मगर विदेशी मीडिया, खासकर चीन और ऑस्ट्रलियाई पत्रकार, रोंजन को पदक का बहुत मज़बूत दावेदार मान रहे हैं। बेलग्रेड में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के बाद चीन के एक संवाददाता रेन यान ने प्रतिष्ठित अखबार 'पीपल्स डेली' के लिए भारत में रोंजन का लंबा इंटरव्यू किया। रेन यान कहते हैं कि चीन में सभी भारतीय शूटरों को पदक का मज़बूत दावेदार माना जा रहा है। ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन के माइकेल कोगैन की राय भी इससे ज्यादा अलग नहीं है। उनका मानना है कि भारतीय शूटिंग टीम इस बार इतिहास कायम कर सकती है और अगर मौका मिला तो खेलप्रेमी यह इतिहास रोंजन के 12 बोर के बेरेटा गन के ज़रिये देख सकेंगे।

जर्सी पिचानवे हज़ार की...

जर्सी पिचानवे हज़ार की...
विमल मोहन
नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, जून 12, 2008

इन दिनों जब आप टेलीविजन से चिपककर यूरो कप के मुकाबलों का लुत्फ़ उठा रहे होंगे या फिर यह जानने की कोशिश कर रहे होंगे कि 20-20 आईपीएल के कौन-से सितारे वन-डे में भी अपना कमाल दिखाते हैं, चंडीगढ़ के सेक्टर 18 के घास के हॉकी मैदान पर सिक्स-अ-साइड हॉकी टूर्नामेंट कुछ चुनिंदा दर्शकों के जुनून की वजह बना हुआ है।

यह टूर्नामेंट भारतीय हॉकी के लिए कई वजहों से बेहद ख़ास है। चंडीगढ़ में घास के हॉकी मैदान पर चल रहे (8-12 जून तक) चल रहे सिक्स-अ-साइड हॉकी टूर्नामेंट में हर रोज़ करीब हज़ार ख़ास दर्शक अपनी टीमों का हौसला बढ़ाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। यहां हॉकी के दिग्गज कोच रिक चार्ल्सवर्थ भी होते हैं और होते हैं सैकड़ों शोर मचाते दर्शक... लेकिन इन सबमें चंडीगढ़ की 11 साल की पारुल की तालियों की अलग ही आवाज़ होती है। वह भारतीय टीम के खिलाड़ी राजपाल सिंह की और उनकी इंडियन आयल टीम की बहुत बड़ी फैन लगती है।

टूर्नामेंट से पहले जब ओलम्पियन प्रभजोत सिंह, दीपक ठाकुर और राजपाल जैसे खिलाड़ियों की एक-एक जर्सी पर बोली लगी, उस वक्त होटल में 11 साल की पारुल की मौजूदगी ने खिलाड़ी और टूर्नामेंट आयोजकों का जोश दूना कर दिया। चंडीगढ़ के एनपीएस स्कूल की पारुल, राजपाल की उस जर्सी के लिए 25-30000 रुपये की बोली लगाने का इरादा लेकर आई थी, जिसे पहनकर राजपाल ने 2007 के चेन्नई एशिया कप के फाइनल में कोरिया के ख़िलाफ़ दो गोल किए थे (और खिताब भारत ने जीता था)। यह और बात है कि वह जर्सी एक ऐसे एनआरआई फैन के हाथ लगी, जो सिडनी से आया था। इस हॉकी फैन का नाम भी राजपाल है, और उसने 2001 में होबार्ट में हुए जूनियर वर्ल्ड कप के दौरान राजपाल सिंह को खेलते देखा था (भारत ने वहां भी खिताब अपने नाम किया था)।

ओलम्पियन दीपक ठाकुर मौजूद नहीं थे, फिर भी उनकी टी-शर्ट 45000 रुपये में फैन के हाथों में गई तो प्रभजोत की जर्सी 95000 रुपये में बिकी। बाद में जब इन तीनों हॉकी फैन से पूछा गया तो उन्होंने कहा, वे इन टी-शर्ट की कीमत दो लाख से लेकर 10 लाख तक लगाने को तैयार थे। उससे भी बड़ी बात यह है कि जब हॉकी को लेकर आम लोगों का जोश ठंडा पड़ता दिख रहा है और यह राष्ट्रीय खेल भारत में दम तोड़ता नज़र आता है, ये फैन, खेल और खिलाड़ी के लिए संजीवनी साबित हो सकते हैं।

इस नीलामी से ठीक पहले धरम सिंह मेमोरियल हॉकी टूर्नामेंट के सचिव ओलम्पियन सुखबीर सिंह गिल, राजपाल और प्रभजोत सिंह के साथ होटल के बाहर लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे थे। उनके चेहरों पर कहीं न कहीं एक डर ज़रूर था... प्रभजोत बार-बार अपने एक हज़ार की लाल शर्ट की बांह पकड़ रहे थे और यह समझना मुश्किल नही था कि वह किसी अहम मैच से पहले की हालत में हैं और नर्वस हैं।

दरअसल भारतीय टीम के ओलम्पिक में क्वालिफाई न कर पाने की वज़ह से इस बार टूर्नामेंट का आयोजन बेहद मुश्किल लग रहा था। सिर्फ़ तीन लाख रुपये के बजट वाले इस सिक्स-अ-साइड टूर्नामेंट के लिए थोड़े पैसे लगाने को भी कोई स्पॉन्सर तैयार नहीं था। ओलम्पियन सुखबीर सिंह गिल, राजपाल कई धन-कुबेरों का दरवाजा खटखटा चुके थे। तब राजपाल ने अपनी जीत की सुनहरी यादों की नीलामी की बात सोची। इन खिलाड़ियों ने सोचा - इससे न सिर्फ़ टूर्नामेंट का छठे साल भी आयोजन मुमकिन हो पाएगा, बल्कि सरकार और दूसरे प्रायोजकों को भी हॉकी की हकीकत पता चलेगी।

टीम इंडिया के मशहूर फॉरवर्ड दीपक ठाकुर हॉकी के इस दर्द से अच्छी तरह वाकिफ हैं। वह ख़ुद भी इस दर्द में शरीक हो गए और भारतीय हॉकी से जुड़ी पहली नीलामी का हिस्सा बन गए। राजपाल कहते हैं कि यह टूर्नामेंट यूरोप में बेहद मशहूर है। ऑफ़ सीज़न में यूरोप के इन्डोर स्टेडियमों में इस तरह के टूर्नामेंटों का जलवा अपने शबाब पर होता है। खासकर, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देशों में यह काफी लोकप्रिय है। मशहूर ऑस्ट्रेलियाई कोच रिक चार्ल्सवर्थ मानते हैं कि इन्डोर हॉकी का जर्मनी की टीम पर अच्छा-खासा असर पडा है। यही वजह है कि जर्मनी की टीम पिछले दो बार से इन्डोर और आउटडोर दोनों तरह की हॉकी में वर्ल्ड चैम्पियन है। चार्ल्सवर्थ मानते हैं कि अगर योजना बनाकर भारत में इस तरह की हॉकी (टर्फ पर) खेली जाए तो इसका फायदा भारत को भी पहुंच सकता है, लेकिन उनका मानना है कि भारतीय हॉकी अब भी ढुलमुल रवैये से हटा नहीं है।

ओलम्पियन प्रभजोत सिंह इस तरह की छोटे पैक वाली हॉकी (इन्डोर हॉकी के नियमों के साथ 30-40 मिनट में छोटे मैदान पर खेली जाने वाली हॉकी) का रणनीतिक फायदा देखते हैं। उनके मुताबिक इस तरह की हॉकी में स्पीड बहुत ज़्यादा होती है, इसलिए यह भारतीय खिलाड़ियों को यूरोपीय शैली से निपटने में मदगार साबित हो सकती है, इसलिए उन्होंने इस टूर्नामेंट को बचाने की कोशिश की है।

ऐसा नहीं है कि टी-शर्ट की नीलामी नई बात है। फ़ुटबाल स्टार माराडोना और जॉर्ज बेस्ट की टी-शर्ट से लेकर ब्योन बोर्ग जैसे टेनिस स्टार के स्पोर्ट्स गियर खूब महंगे दामों में बिकने की वजह से शोहरत कमा चुके हैं, लेकिन भारतीय हॉकी के इतिहास में यह अनूठी बात है... और शायद इसलिए कुछ परम्परावादी खिलाड़ियों को खटकने भी लगी।

ओलम्पिक खेलों में दो बार भारतीय टीम के कप्तान रह चुके परगट सिंह नीलामी को सही तो नहीं मानते, पर इन खिलाड़ियों की सराहना भी करते हैं... लेकिन सुखबीर गिल कहते हैं, 'इसमें क्या बुराई है। आईपीएल के दौरान तो क्रिकेटरों की खुलेआम बोलियां लगी। हम तो कम से कम इनकी जर्सियों को बेचकर एक टूर्नामेंट में जान फूंकने की कोशिश कर रहे हैं...'

राजबीर सुखबीर की बातों से उतना ही इत्तफाक रखते हैं और कहते हैं, 'भाई साहब, अब छिपाने से कुछ नहीं होने वाला। लोगों को सच मालूम होना चाहिए। तभी कुछ ठीक होगा...' राजबीर की बातों में जर्मन चिन्तक-कवि-नाटककार बेरटोल्ट ब्रेष्ट की आवाज़ (सच हमें जोड़ता है) सुनाई देती है। ब्रेष्ट की यह कविता कहती है...

'भाइयों यह किस बारे में है...

मैं तुमसे साफ-साफ कहूंगा...

कि जिन मुश्किल हालात में हम फंसे हैं...

उनसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नही है...'

दोस्तों, इसे दृढ़ता से स्वीकारो और स्थिति का सामना करो... जब तक...

वॉर्न का दर्शन : जीत का दर्शन

वॉर्न का दर्शन : जीत का दर्शन
विमल मोहन
नई दिल्ली, शनिवार, मई 31, 2008
'अत्तदीपा विहरथ' ...बौद्ध दर्शन में इस सूक्ति का मतलब है अपना दीपक ख़ुद बनो यानी अपना रास्ता स्वयं बनाओ। पता नहीं शेन वॉर्न का कभी बौद्ध दर्शन से वास्ता पड़ा या नहीं, लेकिन सेमीफाइनल से पहले मुम्बई को एक मैच में हराने के बाद उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि उनकी टीम का नारा है, 'अपना रास्ता ख़ुद बनाएं, हो सकता है आपको मैच में सिर्फ़ एक या तीन गेंदों के सामना करने का मौका मिले, लेकिन अगर आप मौके का सही फायदा उठाते हैं तो आप हीरो बन सकते हैं।'

शेन वॉर्न ने अपनी टीम में ये बात घुट्टी की तरह पिला दी थी इसलिए आईपीएल की सबसे सस्ती टीम आज एक बेशकीमती टीम बनकर सबके सामने आई है और उम्मीद की जा रही है कि वॉर्न के रॉयल सैनिक अगले सत्र में दूसरी सभी टीमों की नज़रों में छाये रहेंगे। इन सबका श्रेय टीम के मालिक 'इमर्जिंग मीडिया' को भी देना पड़ेगा, जिन्होंने टीम चुनते वक्त सही तरीके से इस पर काम किया और बड़े नामों पर जाने के बजाए खिलाड़ियों को उनके फॉर्म के आधार पर चुनने पर ज़ोर दिया।

हालांकि टीम जब आईपीएल में अपना पहला मुकाबला डेल्ही डेयरडेविल्स से हार गई तो टीम पर फब्तियां कसी गईं और इसके कर्ता-धर्ता भी सकते में आ गए। 'इमर्जिंग मीडिया' के चेयरमैन मनोज बाडाले कहते हैं, 'अगर मैं यह कहूं कि हमें अपनी टीम को लेकर कोई शको-शुबहा नहीं था तो मैं ग़लत कहूंगा। टीम चुनते वक्त हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि शेन वॉर्न टीम के लिए राइट च्वाइस हैं, लेकिन दिल्ली से हार के बाद हमने टीम की मीटिंग की और उनसे कहा कि वो हार से नहीं घबराएं। फिर मैदान पर टीम में जोश भरने का काम वॉर्न ने बखूबी निभाया।'

टीम के अन्दर और बाहर सभी मानते हैं की टीम में सीनियर हों या जूनियर सभी खिलाड़ी वॉर्न की खूब इज्ज़त करते हैं। इसकी बड़ी वज़ह सिर्फ़ उनका अपना कद नहीं, बल्कि उनके संवाद कायम करने की गज़ब की काबिलियत भी है। यही वज़ह है कि टीम में ग्रेम स्मिथ से लेकर रविन्द्र जडेजा जैसे खिलाड़ी भी वॉर्न के सामने अपनी बात रख सकते हैं।

क्रिकेट इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक, इस खेल में बल्लेबाजों को बिगड़ैल नवाब (पैम्पर्ड एरिस्टोक्रेट) माना जाता है और कप्तान चुनते वक्त अधिकारी खेल के आरंभिक इतिहास से लेकर अब तक अक्सर गेंदबाजों के ख़िलाफ़ फैसला लेते रहे हैं। अपनी किताब 'अ कॉर्नर ऑफ द फॉरेन फील्ड' में रामचंद्र गुहा एक दिलचस्प वाकये का ज़िक्र करते हैं।
जब 1910 के दशक में 'द क्वार्द्रन्गुलर' टूर्नामेंट में ' द हिंदूज' टीम की कप्तानी बांये हाथ के महान स्पिन गेंदबाज़ पल्वंकर बालू को कभी नहीं मिली और इसके लिए दलील दी जाती रही कि वो गेंदबाज़ हैं।

करीब सौ साल बाद भी ये सोच ज़्यादा नही बदली है। आईपीएल की आठ में से सात टीमों के कप्तान बल्लेबाज़ हैं। वॉर्न को हैम्पशायर और विक्टोरिया की टीमों की कप्तानी का अनुभव तो है, लेकिन वो ऑस्ट्रेलिया के कप्तान नहीं बन सके। ऐसे में राजस्थान रॉयल्स टीम की कप्तानी के लिए वॉर्न के नाम पर मुहर लगाना हिम्मत की बात थी।

राजस्थान रॉयल्स सहित कई दूसरी टीम के खिलाड़ी दबी जुबां में कहते हैं कि कई भारतीय कप्तानों और वॉर्न में एक बड़ा फर्क बेहतर संवाद कायम करने का ही है। राजस्थान रॉयल्स के सीईओ फ्रेज़र कैस्टैलिनो कहते हैं, 'दूसरे राउंड में टीम चुनते वक्त वॉर्न ने सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन पहले राउंड में भी हमने खिलाड़ियों के आंकडों को खूब जांचा परखा। हमने देखा कि हरेक खिलाड़ी ने कितने रन बनाए, किस औसत से रन बनाए, कितने शतक लगाए, खिलाड़ी का स्ट्राइक रेट क्या है..वगैरह-वगैरह। यही नहीं हमने टीम के कोच से पूछा और दूसरे कोच से भी इसकी जांच की इसलिए हमें भरोसा रहा कि जिन खिलाड़ियों को हमने चुना है उनमें काबिलियत है और वो टूर्नामेंट में ज़रूर चलेंगे।

वॉर्न की लीडरशिप में ये खूब चमके भी।' इसलिए दूसरी कई बड़ी और महंगी टीमों के सुपरस्टार नाम बड़े और दर्शन छोटे साबित हुए। दरअसल, एक और बड़ा फर्क नेतृत्व का रहा। दूसरी टीमों के कप्तान अगर मैदान पर तालमेल कायम करने में विफल रहे तो उनके मालिकों ने उनके काम को और मुश्किल कर दिया, लेकिन शायद ये आज बाज़ार की हकीकत है और किसी भी खेल की फितरत बन गई है।

चैंपियंस लीग में शानदार खेलने के बावजूद चेल्सी की टीम फाइनल मुकाबला पेनल्टी शूट आउट में हारी। मगर फिर भी अव्राम ग्रांट को कोच के पड़ से हाथ धोना पड़ा।यकीनन ऐसा आईपीएल में भी होगा, लेकिन अगली बार जब टीम चुनने की कयावाद होगी या टीम में बदलाव की बात की जाएगी तो राजस्थान रॉयल्स का उदाहरण ज़रूर सभी टीमों के लिए जीत तक पहुंचने का दर्शन साबित होगा।

Monday, May 12, 2008

शाहरुख़ के एसएमएस

'हार कर जीतनेवाले को बाजीगर कहते हैं'....जिस फ़िल्म में शाहरुख़ खान ये डायलॉग कहते हैं उस फ़िल्म में उनका किरदार निगेटिव है.....लेकिन आप किंग खान के किसी भी नाइट राइडर्स से बात करें तो वो कहते हैं...'कमाल का बन्दा है'.... क्रिकेट टीम के धुरंधरों को खेल-भावना का पाठ पढानेवाले इस बाजीगर ने अपनी टीम के दिल में घर बना लिया है.

आईपीएल के पहले दो मैचों में शानदार जीत के बाद जब कोलकाता नाइट राइडर्स को लगातार चार हार का सामना करना पडा तो इस टीम के बड़े समर्थक भी इसकी आलोचना करते नज़र आये. लेकिन कभी ख़ुद एक अच्छे खिलाड़ी रह चुके शाहरुख़ ने हार नही मानी. उन्होंने अपनी टीम के साथ एक बड़ी पार्टी की. पार्टी में सभी खिलाडियों को कॉम्पैक का एक-एक कंप्यूटर दिया और दुनिया की नज़रों में हार का जश्न मनाया. इस पार्टी में शाहरुख़ ने अपनी टीम का जैसे मनोबल बढाया वो लाजवाब है.

शाहरुख़ ने अपनी टीम से कहा की अगर आप हारकर उठ नही सकते तो आप चैम्पियन नही हैं. किंग खान ने अपने बेटे का उदाहरण देते हुए कहा ".. मैं नही चाहता हूँ कि आर्यन ( बेटा) कभी मार खाकर घर आए...लेकिन ये भी सही है कि अगर वो मार नही खायेगा तो कभी चैम्पियन नही बनेगा."

शाहरुख़ ने अपनी टीम में ये विश्वास भर दिया कि वो चैम्पियन हैं....और हारना एक सहज प्रक्रिया है... अगर आप इसे बिजनेस का भी नाम देना चाहते हैं... तो बिजनेस का भारत में ये अनूठा तरीका है..... शाहरुख़ कहते हैं " मुझे हार पसंद नही लेकिन मेरा बेटा अगर हार जाता है तो मैं उसे घर से निकाल नही देता. मैं उसे ट्रेन करता हूँ कि आगे वो जीतकर आए."

हर मैच से पहले शाहरुख़ टीम के सभी खिलाड़ियों को लंबे-लंबे एसएमएस करते हैं. लेकिन संदेश की इस प्रक्रिया में उनका मकसद टीम का हौसला बढ़ाने की कोशिश भर होती है. वो टीम पर दबाव नही डालते. वो खिलाडियों से खुलकर कहते हैं "आपको एक्टिंग नही आती, मुझे क्रिकेट नही आती. क्रिकेट खेलना आपका काम है. लेकिन आप मैच हार नही मानने जज्बे के साथ ही खेलें. "

कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के आकाश चोपडा कहते हैं कि बन्दे में बहुत दम है. आकाश कहते हैं की टीम के सभी खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ शाहरुख़ की लीडरशिप और उनकी कमाल की खेल भावना के कायल हैं. शाहरुख़ अपनी टीम से बार-बार कहते हैं कि अब वो टीम के साथ हैं...इसलिए जीतेंगे तो टीम की तरह और डूबेंगे तो साथ-साथ.

आईपीएल शुरू होने से पहले ही जब शाहरुख़ ने कहा कि अगर वो कामयाब नही रहे तो पहले साल के बाद वो प्रीमियर लीग का साथ छोड़ देंगे. इसे लेकर विवाद तो हुआ लेकिन कम से कम शाहरुख़ के ईमानदारी से अपनी बात सबके सामने रखने की दाद देनी होगी. ये एक पारदर्शी तरीका है जब किसी कम्पनी के मालिक ने खेल शुरू होने से पहले ही अपनी टीम के सामने अपना लक्ष्य साफ कर दिया.

शाहरुख़ अपनी टीम से बात करते वक्त खिलाडियों को अहसास कराते हैं कि वो बहुत ख़ास हैं...और उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि वो उनकी टीम के लिए खेल रहे हैं... शाहरुख़ की टीम पहले प्रीमियर लीग का खिताब जीते या नही....उनकी टीम के लिए उनसे बड़ा चैम्पियन कोई नही.

Thursday, May 8, 2008

बीजिंग ओलिम्पिक का पदक करेगा न्याय

गगन नारंग ने ८ मई, २००८ (आज) चेक गणराज्य के पिल्जें में एक वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया. क्योंकि ये प्रतियोगिता अंतर्राष्ट्रीय शूटिंग संघ के कैलेंडर में शामिल नही, इसलिए इस रिकॉर्ड को मान्यता नही मिलेगी. लेकिन
चेक गणराज्य में आयोजित शूटिंग की ग्रां प्री में ५० मीटर प्रोन प्रतियोगिता में वर्ल्ड रेकॉर्ड स्कोर (६००/६००) किया तो हैरानी सिर्फ़ इसलिए हुई कि ये उनका ख़ास ईवेंट नही है.

गगन दुनिया के वर्ल्ड नंबर एक खिलाड़ी रह चुके हैं. पिछली दफा एथेंस ओलिम्पिक्स में वो १० मीटर एयर राइफल के फाइनल में सिर्फ़ एक अंक से पहुँचने से रह गए थे. इस बार अंतर्राष्ट्रीय शूटिंग संघ ने अपने वेबसाइट में उन्हें भारत की ओर से मेडल जीतने वाले प्रबल दावेदारों की फेहरिस्त में शामिल किया है...गगन को दरअसल १० मीटर एयर राइफल प्रतियोगिता के महारथी हैं...

गगन ने ई-मेल के ज़रिये कहा कि वो बहुत खुश हैं...लेकिन इतने प्रतिभाशाली खिलाड़ी के पीछे आज से ठीक तीन महीने पीछे जब दुनिया दीवानी नज़र आयेगी तब हिन्दुस्तानी खेल प्रेमियों को वाकई बड़ी खुशी होगी.

मैं वो दिन देख रहा हूँ जब स्पांसर गगन की हर चाल, अदा को भुनाते नजाए आयेंगे. टेलीविज़न के पत्रकार इस खिलाड़ी के हर इंटरव्यू से अपना नंबर बढाते नज़र आयेंगे. प्रिंट के पत्रकार भी शायद इसे लेकर तरह-तरह के दावे पेश करें. लेकिन आज हकीकत ये है कि कोई भी न्यूज़ चैनल इस ख़बर को अपना १० सेकेंड देनें में भी अपनी तौहीन समझ रहा है. शायद सभी न्यूज़ चैनल जानते हैं कि ये ख़बर कोई नही देखना चाहता और ये फैसला कर चुके हैं ये बतकही है ख़बर नही. क्या ये वाकई ख़बर नही है? क्या आप ये नही जानना चाहते की तीन महीने बाद ओलिम्पिक में कौन भारतीय खिलाड़ी पदक पर अपना नाम लिख सकता है?

क्या हो गयी है खेल पत्रकारिता

आज मैं कुछ खेल के पत्रकारों की बातें सुन रहा था. वो भारत मैं आए खली द ग्रेट की बातें कर रहे थे. मैं दंग था. जिस तरह वो खाली के गुर-दाँव पर विशेषज्ञों की तरह बात कर रहे थे मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी ...इस दौरान इन विशेषज्ञों की वजह से मैंने डब्लूडब्लूई के हेड -बट, खली वाइज़- ग्रिप, खली बॉम्ब, बिग बूट, स्पिन किक जैसे कई दावों के नाम सुने. और मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी कि इस विषय पर ये कितनी देर बात कर सकते हैं.

इत्ताफाकन 100 मीटर स्प्रिंट की बात भी चल पडी..और तब जो मैंने सुना या नही सुन पाया उसने मुझे ज्यादा हैरान किया. ताज्जुब हुआ कि किसी को ये नही पता था की हाल में 3-4 दिन पहले किसने 100 मीटर की रेस मैं एक इतिहास कायम किया है. मैंने थोड़ा हिंट देने की कोशिश की कि ये खिलाड़ी असाफा पॉवेल के देश (जमैका) का रहनेवाला है. खबरों की दुनिया और उसमें भी भी खेल की दुनिया से जुड़े पत्रकारों का ये हाल था कि उन्होंने उसैन बोल्ट के अलावा सबका नाम ले लिया.

ज़ाहिर है उसने ये रेस 9.76 सेकेंड में ये दौड़ पूरी की होगी इसकी उम्मीद करना छलावा ही होता. लेकिन 10 सेकंड के अन्दर ही ये पत्रकार 100 मीटर दौड़ के भी विशेषज्ञ बन गए. इसे लाजवाब आत्मविश्वास कहें या अपने आप के प्रति बेमिसाल उद्दंडता या फिर कुछ और ये आप तय करें....

'तेरी माँ को बख्शा' तो....

माँ को बख्शा' तो....

बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट संघ) कमाल है. उसने इसी साल सिडनी टेस्ट (2-6 जनवरी, भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया ) के दौरान और उसके बाद उस खिलाड़ी का बचाव किया, जिसने माना कि मैदान पर उसने दूसरे खिलाड़ी (एंड्र्यू साइमंड्स) को गाली दी..चलिए मसला दूसरे देश के खिलाड़ी और रेसिज्म से जुडा था, इसलिए बचाव कर भी लिया...पर क्या उस वक्त भारत में उस खिलाड़ी को सज़ा नही दी जानी चाहिए थी ? कम से कम ये कहकर कि भारत में इस गाली को ख़राब माना जाता है.... और किसी भी रोल मॉडल या मानी जानी वाली हस्ती को ये सब कहने-करने से पहले दस बार सोचना पडेगा...

अब भज्जी ने जो किया बीसीसीआई के अधिकारी उसे पचा नही पा रहे..नैतिकता के प्रणेता बने फिर रहे हैं..भज्जी के खुलेआम माफीनामे के बाद भी कह रहे हैं कि इस खिलाड़ी का ट्रैक रेकॉर्ड ख़राब है. लेकिन ये समझना चाहिए कि जो खिलाड़ी माँ की गाली के बाद किसी हीरो की तरह सराहा जाएगा वो आगे वैसा कर सकता है जैसा उसने किया.

आपने एक चोर की कहानी सुनी होगी जिसकी माँ उसे बचपन में चोरियाँ करना सिखाती थी. बाद में वो बड़ा मशहूर चोर बन गया. बहुत वर्षों बाद जब जवानी में वो चोर पकड़ा गया तो उस राज्य के राजा ने उसे फांसी की सज़ा दे दी. फांसी के पहले चोर से उसकी आख़िरी इच्छा पूछी गयी. उसने कहा वो मरने से पहले अपनी माँ के कानों में कुछ कहना चाहता है. उसे इसकी इजाज़त मिली. वो अपनी माँ के कानों में कुछ कहने गया और ये कहकर कान काट लिया की ये सब उसी ने उसे सिखाया है. इसलिए उसे भी सज़ा मिलनी चाहिए. बीसीसीआई चोर की माँ की भूमिका निभा रहा है.

वैसे भी मैदान पर मारपीट की ये पहली घटना नही है. साल पहले 2006 फुटबॉल कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदान ने इटली के मार्को मतेरात्जी को मैदान पर हेड-बट से गिराया तो उसकी आलोचना हुई. जिदान और उसकी टीम को उसका भारी खामियाजा भी भुगतना पडा. लेकिन उन्हें फांसी पर नही चढा दिया गया. पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। मगर दोनों का करियर खत्म नही कर दिया गया.

चीन में कर(टैक्स ) चोरी से लेकर, भ्रष्टाचार और मर्डर- सबकी सज़ा फांसी है..हरभजन पर पहले ही बड़ा जुर्माना लगाया जा चुका है..अब दो या तीन सीरीज़ के बैन से लेकर आजीवन प्रतिबन्ध की बात चल रही है.. ऐसा कर बीसीसीआई क्या साबित करना चाहता है? ऐसा करने से पहले उसे अपने दामन में ज़रूर झांकना चाहिए. तब जो उदाहरण वो पेश करेंगे उसका सचमुच कोई मतलब होगा.

Monday, May 5, 2008

सिकुड़ते मैदान ... जाति का बढ़ता दंस

दिल्ली के मुखर्जी नगर में जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार विद्यार्थियों के बीच हुई झड़प या हिंसा से मुझे हैरानी भी हो रही है और एक अजीब किस्म की कसमसाहट भी महसूस कर रहा हूँ.. ... हैरानी इसलिए भी है की जिस इलाके में ये घटना हुई है मैंने कभी वहाँ एक दशक से ज्यादा वक्त गुजारा है...

उन दिनों कम से कम जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार के बीच ऐसी कोई घटना सुनने में नही आयी...ऐसा नही है की उन दिनों वहाँ कोई राम राज्य था...लेकिन जाति को लेकर महानगर में हिंसा का ये रूप आम तो बिल्कुल नही था. क्या जाति का रक्तबीज नए अड्डे तलाश रहा है ?

इतना ज़रूर लगता है की समाज की बीमारी कैंसर टी तेजी से बढ़ती जा रही है. हर रोज़ मामूली बात को लेकर रोड पर होती हिंसा, कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ती अट्टालिकाएं और उससे उपजती तमाम मुश्किलें इन बीमारियों के लक्षण हैं......जब माँ-बाप बच्चों को फक्र से कहते थे कि 'पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब ' - उस वक्त जाति व्यवस्था अपने चरम पर होती थी. उन दिनों पल्वंकर बालू (1876 -1955) जैसे महान स्पिनर को भी टी- टाइम पर बाउंड्री के बाहर आकर चाय पीना पड़ता था (रामचंद्र गुहा- अ कोर्नेर ऑफ डी फोरेन फील्ड ).

कहा जाता है की किसी समाज को पहचानना है तो कभी वहाँ के मैदानों पर चले जाएं. मैदान पर लोगों की तादाद और उनके खेलने के तरीके से आप इलाके का मोटे तौर पर अंदाजा ज़रूर लगा सकते हैं...यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया में जाति को लेकर समाज वैसा नही बँटा जैसा अफगानिस्तान, पाकिस्तान या फिर भारत में है...

लगातार खत्म होते मैदान इसकी बहुत बड़ी वजह हैं..जिस तरह से बिल्डर, नेता और ब्युरोक्रैत के गुप्त गठबंधन
की वजह से अट्टालिकाएं मैदानों का अस्तित्व खत्म कर रही हैं...समाज की कुंठा और कुरूप होकर सबके सामने कभी रोड पर, कभी मुहल्ले में तो कभी गावों में फन काढ़ती नज़र आयेगी.

मतलब ये नही है की मैदानों के बना देने से जाति व्यवस्था खत्म हो जायेगी...मगर आने वाली पीढी स्वस्थ ज़रूर होगी.. वरना हर रोज़ घटती ये घटनाएँ जिस विध्वंस की चेतावनी दे रही हैं उसकी कल्पना से ही दिल दहल जाता है. महानगरों का हर शख्स कम से कम इस बात को लेकर ज़रूर चिंतित होता है कि कहीं वो रोड-रेज का शिकार नही हो जाए. मनोवैज्ञानिक रूप से ये बीमारी का ही लक्षण है... और इन सबको लेकर कम से कम सचेत होने के अलावा और कोई चारा नही.

आईपीएल में दर्शक उपेक्षित हैं

पिछले हफ्ते मैंने बिना किसी पास के, आम दर्शकों जैसा स्टेडियम जाकर आईपीएल का एक मैच (डेल्ही डेअरडेविल्स और राजथान रौयाल्स) देखने की योजना बनाई. पहल तो मैं एक-डेढ़ घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद स्टेडियम के गेट तक पहुँच पाया. उससे पहले गाडी को पार्क करने में जो मुश्किल हुई वो अलग.

जब सुनता हूँ की आईपीएल ७०००-८००० की घरेलू लीग है...इसकी ये खूबियाँ हैं...इससे वो फायदा होगा तो ये भी लगता है... कि आम जनता का और कितना चूसा जायेगा...

४४ दिन के आईपीएल टूर्नामेंट में अब ये तय हो गया है कि जिस दिन भी मैच होगा...आम जनता, जो स्टेडियम जाकर मैच नही देखना चाहती, स्टेडियम के आस-पास से भी गुजरती हैं तो उनकी खैर नही. पिछले हफ्ते मैच देखने की वीरता करने के दौरान कम से कम दो-तीन ऐसे लोगों से मिला जो अस्पताल पहुँचने की जद्दोजहद में जुटे रहे ...लेकिन स्टेडियम जाने वालों की भीड़ उन्हें रास्ता नही दे पायी. दरअसल दोष उनका भी नही. उन्होंने टिकट के लिए पैसे खर्चे थे. इनमे से एक रोगी के परिवार से मेरी बात हुई और उनकी बेबसी देखकर गुस्से के अलावा और कुछ नही किया जा सकता था.

इन सबका उपाय है...अगर बीसीसीआई करना चाहे तो.....मेरे ख़याल से मैचों के लिए अब सभी स्टेडियम को शहर के बाहर बनाया जाना चाहिए..और स्टेडियम तक पहुँचने के लिए लक्ज़री बसें बनायी जानी चाहिए. इससे बीसीसीआई की कमाई का एक और जरिया तो बढेगा ही, आम लोगों को कोई तकलीफ नही होगी...यही नही ब्लैक टिकट और सुरक्षा को लेकर होने वाली समस्याएँ कम से कम हो जायेंगी. ऐसा कब होगा...सरकार कब मैच देखना छोड़कर इन छोटी लगानेवाली बड़ी मुश्किलों की और मुखातिब होगी, ये बड़े सवाल हैं

दरअसल बीसीसीआई अभी खेल और खेलप्रेमियों को सिर्फ़ चूसने का काम कर रही है. ....लेकिन एक कहावत है नीम्बू को इतना मत निचोरो की स्वाद कड़वा हो जाए...
गए तो...पर बेडा गर्क करने के बाद...

मिथकों में आपने गुप्त खजाने पर नागों के कुंडली मारकर बैठने की कहानियाँ ज़रूर सुनी होगी. पिछले एक हफ्ते में हिन्दुस्तान के खेल में दो ऐसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव आए हैं जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं .......

हॉकी संघ बर्खास्त हुई तो गिल को जाना पडा...लेकिन उससे भी बड़ी बात रही पहले हॉकी संघ के सचिव के जोथिकुमारन और वेटलिफ्टिंग संघ के सचिव बलबीर भाटिया ने सचिव का पद छोड़कर दोनों संघों को जैसे किसी श्राप से मुक्ति दे दी है...... जोथिकुमारन १५ साल बाद और बलबीर भाटिया ने करीब एक दशक बाद ओलिम्पिक में पदक जीतने वाले खेलों का पिंड छोड़ा....

सिर्फ़ पाँच साल पहले चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट के पहले मैच में भारतीय टीम हौलैंड के ख़िलाफ़ पहले 60 मिनट तक 3-0 की बढ़त बना कर मैच पर हावी नज़र आ रही थी....लेकिन आख़िरी 7-8 मिनट में 4 गोल ठोककर हौलैंड ने भारत को आखिरकार 4-3 से हरा दिया....फिर भी टीम इंडिया ने लंबे समय बाद दुनिया के कई दिग्गज कोच को खूब प्रभावित किया...यहाँ तक की खिताब विजेता हौलैंड के कोच जूस्ट बल्लार्ट ने खुलकर कहा की भारतीय टीम उनसे बेहतर थी...उन दिनों ऑउस्त्रेलिई कोच रिक चार्ल्सवर्थ टूर्नामेंट की कमेंट्री कर रहे थे.. भारतीय टीम ने उन्हें भी अपनी प्रतिभा का कायल कर दिया था. रिक चार्ल्सवर्थ तो भारतीय खिलाड़ी तेजबीर सिंह को टूर्नामेंट का सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी कह दिया ....

आज वही चार्ल्सवर्थ जब कहते हैं..." भारत में ये आम धारणा बनी हुई है के हमारी टीम में प्रतिभाओं की कमी नही है...सिर्फ़ कुछ चीज़ें ठीक कर लेने से सब ठीक हो जायेगा...मेरे ख्याल से ये ग़लत है...भारत में संभावनाएं हैं...लेकिन ये देखना होगा की इससे ठीक करने की इच्छा और इच्छा शक्ति है या नही..."
ये सुनकर किसी भी हॉकीप्रेमी का दिल बैठ सकता है...

पूर्व हॉकी कप्तान अशोक कुमार (ध्यानचंद के पुत्र) भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं...अशोक कुमार कहते हैं के टीम में अब कोई भी स्टार खिलाड़ी नही है...अब फिर से स्टार बनाने की ज़रूरत है. दरअसल पिछले १५ साल में हॉकी की ज्यादातर खबरें विवादों के ईर्द-गिर्द ही रही हैं....ज़ाहिर है युवा खिलाड़ियों की दिलचस्पी इसमें घटी ही है...इस दौरान शाम को हॉकी स्टिक लेकर मैदान पर जानेवालों खिलाड़ियों को किसी भी शहर,गांवों, मोहल्ले में उँगलियों पर गिना जा सकता है ....

नए खेल मंत्री डॉक्टर एमएस गिल या दूसरे खेल संघ के अधिकारी कैमरे पर आकर चाहे जो बयान दें... ओलिम्पिक संघ के कई वरिष्ठ अधिकारी कैमरा ऑफ होते ही ये भी कहते हैं की आप चाहे जो कहें भारत का राष्ट्रीय खेल अब क्रिकेट है...और क्रिकेट और दूसरे खेलों में बड़ा बन गया है....


वेटलिफ्टिंग की हालत हॉकी से बहुत अलग नही है....2000 के सिडनी ओलिम्पिक खेलों में जब पहली बार महिला वेटलिफ्टिंग को शामिल किया गया....तो संघ के सचिव बलबीर भाटिया पर टीम के चयन में धांधली का आरोप लगा.... लेकिन यमुनानगर की कर्णम मल्लेस्वरी ने इकलौता पदक (69 किलोग्राम वर्ग में 240 किलोग्राम उठाकर कांस्य पदक) जीतकर...सबकी लाज बचा ली....कर्णम ओलिम्पिक खेलों में निजी पदक जीतनेवाली पहली और अकेली महिला खिलाडी बन गयीं. ... संघ के सचिव भाटिया पर लगा दाग भी कांसे की चमक में छुप गया.

चार साल बाद एथेंस में इस टीम से और उम्मीद बढ़ी. लगा वेटलिफ्टर एथेंस में कुछ और नए मुकाम ज़रूर छुएंगे.......मगर इस टीम की दो खिलाड़ी (प्रतिमा कुमारी और सानामाचा चान्हु) डोपिंग में धरी गयीं....और इसकी वज़ह से सभी भारतीय को शर्मसार होना पड़ा....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर प्रतिबन्ध तक लगा दिया गया.

उससे भी बड़े शर्म की बात ये रही की ये सिलसिला आगे भी बरकरार रहा...2006 कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान एकबार फिर भारतीय खिलाड़ी डोपिंग के दोषी पाए गए....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर अंतर्राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग संघ ने फिर प्रतिबन्ध लगाया...ऐसे में खिलाड़ियों को तो सज़ा मिली...मगर एक बार भी किसी अधिकारी पर आंच नही आयी....ख़बर है की इस बार बलबीर भाटिया भ्रष्टाचार के आरोप में घिर सकते हैं.... लेकिन उससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया है....

भारतीय वेटलिफ्टर अधिकारियों पर कई तरह के आरोप लगाते हैं.....लेकिन भारत में खेल संघ इतने ताकतवर हैं की वो अपनी शिकायत सुना नही सकते. वैसे भी क्रिकेट के इस देश में वेत्लिफ्टिंग जैसे खेल अब ज्यादातर नौकरी हासिल करने का जरिया भर रह गए हैं....धीरे-धीरे इस खेल से से मुंह मोड़नेवाले लोगों की तादाद ही नज़र आती है.... ऐसे में ये खेल कब यहाँ दम तोड़ दे आपको ख़बर भी नही होगी...

2006 दोहा एशियाड में भारतीय हॉकी टीम पहली बार पोडियम पर पहुँचने में नाकाम रही तो पाकिस्तान को कांसे से संतोष करना पडा. फ़र्ज़ कीजिये 2012 के लंदन ओलिम्पिक खेलों में भारत के साथ पाकिस्तान हॉकी टीम ओलिम्पिक में क्वालिफाई करने से चूक जाती है .....ऐसे में इस खेल का ओलिम्पिक में टिकना मुश्किल हो जायेगा....इसे ओलिम्पिक से बाहर करने को लेकर पहले भी बहस हो चुकी है....

जर्मनी (मूनशेनग्लाडबाख) में 2006 में हुए हॉकी वर्ल्ड कप के फाइनल को देखने सिर्फ़ 4000 के करीब देखने लोग इकठा हुए...मतलब साफ है इस खेल की जड़ भारत और पाकिस्तान में ही है....अगर यहाँ हालात बिगड़े गए तो एशियाड और ओलिम्पिक के साथ इस खेल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा....हॉकी और वेटलिफ्टिंग से जुड़े खिलाड़ी, फैंस और अधिकारियों के लिए खतरे की घंटी बज रही है....

Wednesday, April 30, 2008

थप्पड़ की गूंज

आज से दस-पन्द्रह साल पहले और उससे भी पहले जब हम मोहल्ले में क्रिकेट खेलते थे, तो समय की कमी की वज़ह से और इसलिए भी कि मैच का नतीजा निकल आए आधे दिन का मैच खेलते थे। मैच उन दिनों भी 20-20 ओवर का ही होता था। ख़ास बात यह थी कि इन मैचों में हारने वाली टीम के कप्तान को जीतने वाली टीम के स्कोर-रजिस्टर में हस्ताक्षर करना पड़ता था, लेकिन हारने वाली टीम का कप्तान अगर कद-काठी में बलवान दिखता था तो कई बार अपने रौब के ज़रिये इस प्रक्रिया से बच जाता था।

आईपीएल में पंजाब के किंग्स इलेवन और मुम्बई इंडियन की टीमों को एक भी जीत नहीं मिली थी, इसलिए दोनों ही टीमें हर हाल में जीत हासिल करने के इरादे से मैदान पर उतरीं। मैच के दौरान श्रीसंत अपने ही स्टाइल में खिलाड़ियों को छेड़ते रहे (रॉबिन उथप्पा, शॉन पोलाक और मुसाविर खोते को), लेकिन उन्हें ये मालूम नहीं था कि मैच के बाद ये उन्हें इतना महंगा पड़ेगा। फिर भी, मैच ख़त्म होने पर मुम्बई इंडियन टीम के कप्तान हरभजन सिंह ने जो कुछ किया वह बिल्कुल ख़राब मोहल्ले क्रिकेट जैसा ही वाकया लगा।

भारतीय क्रिकेट में अनिल कुंबले के बाद सबसे ज़्यादा विकेट (275 टेस्ट विकेट) झटकने वाले स्पिन गेंदबाज़ भज्जी पहले भी विवादों में पड़ते रहे हैं। इस बार भले ही श्रीसंत ने उन्हें माफ़ कर दिया हो लेकिन ये वाकया उन्हें काफी महंगा पड़ने वाला है। साल के शुरुआत में (जनवरी 2007) में सिडनी टेस्ट के दौरान एंड्र्यू साइमंड्स से उनके झगड़े के बाद टीम इंडिया, बीसीसीआई और पूरा देश उनके साथ था लेकिन इस बार वह बिल्कुल अकेले हैं और उनके पीछे उनकी काबिलियत से ज़्यादा उनका विवादास्पद इतिहास है। उनके पंजाब के साथी युवराज (विपक्षी टीम के कप्तान) भी उनसे नाराज़ हैं। हरभजन ने सफाई दी की ये उनके और श्रीसंत के बीच का मामला है जिसे कोई मनाने को तैयार नही, बीसीसीआई भी नही। बड़ी बात ये है की इन सबका असर कहीं उनके फैंस की तादाद पर ना पड़े, और शायद स्पॉन्सर पर भी।

लेकिन, सिर्फ़ इस मुद्दे को लेकर उन्हें मोगेम्बो बना देना भी जायज़ नही लगता। दरअसल ट्वेंटी-20 क्रिकेट की फितरत ही ऐसी है कि इसे नतीजे के लिए खेला जाता है। इसमें पैसे की वज़ह से खिलाड़ियों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव होता है। नतीजा (जीत) हर कीमत पर चाहिए। स्पॉन्सर, खिलाड़ी और उनके फैंस सब इसी चाह से टीम से जुड़े हैं। फिर इस खेल से जेंटिलमेन गेम की धारणा (औपनिवेशिक धारणा) अब लुप्त होती दिख रही है। क्रिकेट तीन घंटे का सिनेमा बना दिया गया है तो इसका सबसे ज़्यादा दबाव खिलाड़ियों पर बढ़ा है। अब यहां फुटबॉल मैदान जैसा जूनून दिखाई पड़ता है तो कई बार वैसी ही झड़प भी देखने को मिल जाती है। फिर ऐसा भी नहीं कि भज्जी की हरकत खेल की दुनिया की अकेली और अनूठी हरकत है।

करीब दो साल पहले 2006 वर्ल्ड कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदाने के किए गए हेड बूट (इटली के मार्को मतेरात्जी के ख़िलाफ़) को कौन भूल पाया है। उसी तरह करीब पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। खूब बखेड़ा हुआ। दुनिया भर के अखबारों में ये खबरें छाई रहीं।

खेल की दुनिया में ऐसे किस्से, विवादों के न जाने कितने उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे। क्रिकेट में भी ड्रेसिंग रूम में ऐसे कई विवाद होते हैं जो सबके सामने नही आते। क्रिकेट स्टार शोएब अख्तर की मानें तो पाकिस्तान ड्रेसिंग रूम में छुरियां तक निकल चुकी हैं। हां, इन सबको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है जो जायज़ भी है। भज्जी भी इससे बचकर नही निकल सकते। भारतीय ड्रेसिंग रूम में भी ऐसी कई घटनाएं होती रही हैं जो कभी आप तक नही पहुंच पाईं। फिर श्रीसंत को तो पूरी दुनिया ने टेलिविज़न और तस्वीरों में फफक-फफक कर रोते देखा है।

भज्जी और दूसरे क्रिकेट खिलाड़ियों को अब यह याद रखना होगा की भारतीय फैन और मीडिया क्रिकेट के साथ अब खेल से ज्यादा धर्म और जुनून की तरह व्यवहार करते हैं। इसलिए ये फैंस अब उनके क्रिकेट करियर में उन्हें इस घटना के बगैर याद नही करेंगे। खासकर तब तो बिल्कुल भी नही जब उनका प्रदर्शन मैच में ख़राब होगा।

बीसीसीआई ने भज्जी को आईपीएल से निलंबित कर साफ कर दिया है की उन्हें आसानी से मुक्ति नही मिलने वाली। अस्सी के दशक के आख़िर में सुभाष घई की एक फिल्म के खलनायक डॉ. डेंग को हीरो दिलीप कुमार एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाते हैं, तो डॉ. डेंग कहता है "इस थप्पड़ की गूंज सूनी तुमने राणा। अब तुम्हें इस गूंज की गूंज सुनाई देगी।" न्यूज़ चैनल्स और अखबारों ने ये तय कर दिया है की भज्जी जब तक क्रिकेट खेलेंगे उन्हें इस थप्पड़ की गूंज सुनाई देगी और अब उन्हें आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ) की भी पैनी निगाहों के पहरे में खेलना होगा।

पैसा हज़म, हॉकी खत्म

पर्थ में हो रहे फ़ोर नेशन्स हॉकी टूर्नामेंट में दक्षिण कोरिया ने भारत को 4-1 से हरा दिया। इस खबर को जानने की बेताबी हुई कि जिस टीम को आठ महीने पहले भारत ने चेन्नई एशिया कप के दौरान दो बार हराकर एशिया कप का ख़िताब जीता था, उसके हाथों बुरी तरह कैसे हारा, लेकिन अखबारों में यह खबर भी ढूंढनी पड़ी कि भारतीय टीम दक्षिण कोरिया से हार गई है। आठ पंक्तियों की भी मैच रिपोर्ट किसी अखबार में छपी नहीं दिखी। ऐसे में बाज़ार और टीआरपी से पीड़ित टीवी चैनलों में इस खबर को ढूंढना बेमानी ही लगा। हां, हॉकी को लेकर मैदान के बाहर के विवाद की खबरें झमाझम दिखीं।

शायद यही हॉकी का दर्द है...

जिस दिन हॉकी संघ के सचिव के. ज्योतिकुमारन रिश्वत लेते कैमरे पर पकड़े गए, इस संवाददाता ने धनराज पिल्लै से फो़न पर बात की। धनराज ने कहा, मैं खबर सुनकर इतना चौंक गया कि मेरे होश उड़ गए। मैं (मुंबई में) अपनी गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर सोच में पड़ गया और 15 मिनट बाद ही वहां से चल पाया। धनराज ने कहा कि उनके पास पत्रकारों और हॉकी खिलाड़ियों के फ़ोन आ रहे हैं कि अगर अब नहीं कहा तो लोग यह भी कहेंगे कि कहीं धनराज या ज़्यादातर खिलाड़ी पैसे लेकर ही तो ओलंपिक नहीं खेलते। कुछ ऐसी ही बात 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा ओलम्पिक्स में भारतीय टीम के कप्तान परगट सिंह ने भी की। उन्होंने कहा मेरे तो पांव कांप रहे हैं। उन्होंने कहा कि ज्योतिकुमारन को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

हॉकी प्रेमी और जानकार इस खबर के बाद दुखी भी हैं और हैरान भी, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये बातें हॉकी की बात करने वाले इससे जुड़े लोग जानते नहीं थे। 1975 वर्ल्ड कप में फ़ाइनल गोल करने वाले अशोक कुमार (हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के पुत्र) मानते हैं कि ये चीज़ें हॉकी में कई साल से चल रही है। वो ऐसी कई खबरें विश्वस्त सूत्रों से सुनते रहे हैं। यह और बात है कि सबूत अब सामने आया है। अशोक कुमार और ज़फ़र इक़बाल जैसे कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक कहा कि चलो अच्छा हुआ, इसी बहाने हॉकी से गंदगी साफ़ तो होगी।

हॉकी टीम में चयन को लेकर सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं, लेकिन कई पूर्व ओलंपियन मानते हैं कि पहले की धांधली में खिलाड़ियों में 19-20 का फ़र्क होता था, लेकिन पिछले 15 साल में (गिल और ज्योतिकुमारन के कार्यकाल में) ये सारी सीमाएं टूट गईं। 2004 एथेंस ओलम्पिक्स से पहले भारतीय हॉकी टीम एरिज़ोना (अमेरिका) अभ्यास के लिए गई। वहां टीम में एडम सिंक्लेयर नाम के खिलाड़ी को लिया गया तो टीम के दूसरे खिलाड़ियों की भौंहें तन गईं। पूर्व कप्तान गगन अजित सिंह ने कहा, मैंने तो इस खिलाड़ी का नाम भी नहीं सुना था। अगर जूनियर टीम से किसी को शामिल किया जाता है तो आमतौर पर पता होता है कि वह कैसा खेलता है, लेकिन इस खिलाड़ी के बारे में तो टीम में कोई कुछ नहीं जानता। बाद में पता चला, यूनिवर्सिटी स्तर का यह खिलाड़ी हॉकी से कम, एथलेटिक्स (ट्रिपल जंप, लॉन्ग जंप) से ज़्यादा वास्ता रखता है।
यह पहला मौका है, जब 80 साल के ओलम्पिक इतिहास में भारतीय हॉकी टीम बीजिंग खेलों में मौजूद नहीं होगी, लेकिन उससे भी बड़ी हैरानी यह देखकर हो रही है कि ज़्यादातर लोग इस खेल को भारत में हमेशा के लिए खत्म मान रहे हैं। इसमें खासकर उन लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है, जो क्रिकेट और उसके आईपीएल जैसे साइड इफेक्ट्स से ओतप्रोत हैं।

नए खेल मंत्री डॉ. एमएस गिल ने एक दिन पहले ही (23 अप्रैल को) ऐलान किया कि भारतीय हॉकी टीम चाहे 10 बार बुरी तरह हारे, फिर भी वह हॉकी को ही राष्ट्रीय खेल मानेंगे, क्योंकि इस खेल से लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं। उनके मुताबिक हॉकी और फ़ुटबॉल जैसे खेल ही आम लोगों का खेल साबित हो सकते हैं। कम से कम इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि उनकी कथनी और करनी में फ़िलहाल ज़्यादा फ़र्क नहीं दिखता। उन्होंने हॉकी सहित सात दूसरे खेलों को सरकार की प्राथमिकता सूची में लाने का ऐलान कर दिया। आते ही उन्होंने अपने सहपाठी केपीएस गिल से भी हॉकी संघ के अध्य्क्ष का पद छोड़कर किसी और को हॉकी का जिम्मा लेने की गुज़ारिश कर डाली।

लेकिन यह भी सही है कि हॉकी के पूरे तंत्र में इतना घुन लग चुका है कि कब पूरी इमारत ढहती दिखे, कोई कह नहीं सकता। हॉकी फिर से आज़ादी के पहले या आज़ादी के बाद '60 के दशक की चमक पा सके, इसके लिए किसी नए खेल को दुनिया के मानचित्र में अव्वल बनाने जैसी कोशिश करनी होगी। इन सबके बीच सकारात्मक बात सिर्फ यह है कि भारत में इस खेल से अब भी करोड़ों लोग जुड़ाव महसूस करते हैं और इस खेल में अब भी यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं।

वन-डे को खा जाएगा आईपीएल...

आज से क्रिकेट में एक नई जंग शुरू होगी और वह कई नई दिशाओं में दौड़ेगा... खिलाड़ियों और टीमों के सपनों को नया आयाम मिलेगा... 44 दिन के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के लिए देश के आठ बिज़नेस किंग ने 3000 करोड़ रुपये से ज़्यादा रकम लगाकर दांव खेला है... ज़ाहिर है, इसकी कामयाबी के लिए ये धुरंधर कोई कसर नहीं छोड़ंगे...

क्रिकेट और ग्लैमर का ये मिलाजुला रूप और उसका प्रभाव दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा... इसकी बड़ी वजह यह भी है कि क्रिकेट को दीवानगी की हद तक चाहनेवाले इस देश में क्रिकेट के बाज़ार की ताकत का सही अंदाज़ा नहीं लगाया जा सका... यह ज़रूर है कि कई जानकार आईपीएल की उपज को इंडियन क्रिकेट लीग (कपिल और एस्सेल ग्रुप) के जवाब के तौर पर देखते हैं... लेकिन उससे बड़ी बात यह है कि बीसीसीआई की आईपीएल ने दुनिया भर के सितारों को इकट्ठा कर इसकी रौनक बढ़ा दी है... यहां तक कि खिलाड़ी अपनी पुरानी काउंटी और देश की टीमों के प्रति ज़िम्मेदारियों से ऊपर उठकर सोच रहे हैं... यह बात दीगर है कि उसके लिए तर्क भी ढूंढ लिए गए हैं...

राजस्थान रॉयल स्क्वाड के शेन वॉर्न के मुताबिक आईपीएल में खेलना खिलाड़ियों को काउंटी से ज़्यादा तरजीह देने की बात नहीं है... उन्हें लगता है कि इससे दुनिया भर में क्रिकेट को बढ़ावा मिलेगा... उनका इशारा न सिर्फ क्रिकेट की लोकप्रियता पर है, बल्कि वह उन हरे नोटों की भी बात कर रहे हैं, जिसे खिलाड़ी कई बार घरेलू स्तर पर पाने से महरूम रह जाते थे...

आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स और बेंगलुरु के रॉयल चैलेंज की टीमें टक्कर लेंगी तो उनकी पहचान खिलाड़ियों से ज़्यादा इनके मालिकों की टक्कर के रूप में होगी... लोगों में होड़ है भी तो इस बात को लेकर कि शाहरुख की टीम जीतेगी या विजय माल्या की... प्रीति ज़िंटा की या मुकेश अंबानी की... दादा और द्रविड़ के नाम पीछे आ रहे हैं...

खालिस क्रिकेट को चाहने वालों में इसे लेकर आपत्ति भी है और डर भी कि कहीं ग्लैमर की चकाचौंध में खेल की मूल भावना दब न जाए... क्रिकेट के प्यूरिस्ट जानकारों को लगता है कि इसका असर टेस्ट या वन-डे पर पड़ना लाजिमी है... 70 टेस्ट और 63 वन-डे खेल चुके पूर्व ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज़ डेनिस लिली (355 टेस्ट विकेट, 103 वन-डे विकेट) मानते हैं कि इसका असर वन-डे क्रिकेट के अस्तित्व पर भी पड़ सकता है... उन्हें लगता है कि इस 20-20 लीग से वन-डे के मुकाबले टेस्ट क्रिकेट को ज़्यादा खतरा है...

दरअसल लिली का डर मीडिया मुगल कैरी पैकर के क्रिकेट आन्दोलन की याद ताजा करता है, जब 70 के दशक में पैकर ने वन-डे क्रिकेट को नई दिशा देने की कोशिश की... उस वक्त भी खालिस क्रिकेट से प्रेम करने वाले लोगों ने वन-डे क्रिकेट को पाजामा क्रिकेट कहकर मज़ाक उड़ाया था... लेकिन वक्त की कमी और ग्लैमर से भरपूर वन-डे ने टेस्ट की चाहत को पीछे ढकेला है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता... भारत जैसे क्रिकेट के दीवाने देश में भी स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी के बावजूद स्टेडियम पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या इतनी कम होती है कि संदेह होने लगता है कि इस देश में क्रिकेट को लोग धर्म की तरह पूजते हैं...

20-20 क्रिकेट भी आज के दौर की हकीकत है... वैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 20-20 क्रिकेट बहुत पुराना नहीं है... लीग और घरेलू स्तर पर अलग-अलग देशों में चाहे यह पहले भी खेला जाता रहा हो, लेकिन पहला अंतरराष्ट्रीय 20-20 मैच ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के बीच फरवरी 2005 में खेला गया... और उसके बाद से साढ़े तीन घंटे का यह मैच जिस रफ्तार से खेला जाता है, उससे भी ज़्यादा तेज़ रफ्तार से बाज़ार में दौड़ रहा है... यह भी उम्मीद की जा रही है कि इन 44 दिनों में कई सितारे बेहद जल्दी दुनिया के मानचित्र पर अपना सिक्का जमाते नज़र आएंगे, तो कई खिलाड़ी इस जुझारू क्रिकेट में अपनी फिटनेस और क्रिकेट पर दांव लगाते नज़र आएंगे...

यही वजह है कि 20-20 अलग-अलग रूपों में लुभावने बाज़ार पैदा कर रहा है... ऐसे में क्रिकेट, मैदानों से बाहर कितने रूप अख्तियार करेगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है...