Monday, July 19, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स के सन्दर्भ में ---

कॉमनवेल्थ गेम्स के सन्दर्भ में ---
बाबा नागार्जुन ने ये पंक्तियां ब्रिटेन की साम्राज्ञी एलिजाबीथ (द्वितीय) के आगमन पर लिखी थी.

आओ रानी हम ढोएंगे पालकी
यही हुई है राय जवाहर लाल की.
-नागार्जुन

अकाल और उसके बाद -नागार्जुन

अकाल और उसके बाद
-नागार्जुन
कई दिनों तक चूल्हा रोया,
चक्की रही उदास/
कई दिनों तक काली कुतिया सोयी उसके पास/
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त/
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.

दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद/
धुआं उठा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद/
चमक उठीं घर भर की आंखें कई दिनों के बाद/
कौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद.

कविता में बिम्ब का इतना सुन्दर और संजीदा इस्तेमाल बाबा नागार्जुन के ही बस का था. वाह अद्भुत!

Saturday, July 19, 2008

वेताल के सवाल

वेताल के सवाल
विमल मोहन
नई दिल्ली, शनिवार, जुलाई 12, 2008

धुन का पक्का विक्रम पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा, उसे कंधे पर डाल लिया और यथावत श्मशान की ओर बढ़ने लगा, तब शव के अन्दर के वेताल (मीडिया) ने विक्रम (रिपोर्टर) से पूछा, 'राजन मैं ये नही जानता कि किस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए तुम इस केस पर इतनी मेहनत कर रहे हो, राजेश तलवार तो जेल से रिहा हो चुके हैं, इसलिए देश की महंगाई पर भी काबू पा ही लिया गया होगा, वैसे भी समस्याओं से भरे इस देश में एक समस्या कम या ज़्यादा हो तो क्या फर्क पड़ता है। वेताल ने कहा कि अगर इन सवालों का जवाब जानते हुए भी तुम जवाब नही दोगे तो तुम्हारी टीआरपी गिरा दी जाएगी तुम्हारे सर के ख़ुद ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।

आपको नहीं लगता बचपन में, चंदामामा में पढ़ी गईं ऐसी तमाम कहानियाँ आज तमाम खबरिया चैनलों की फितरत बन गई हैं। सवाल सिर्फ़ समाज के या ख़बर प्रति संजीदगी या मानवता का ही नही है। क्या आरुषि हत्याकांड, निठारी हत्याकांड या ऐसी ही कई और दूसरी खबरों की बाल की खाल निकालने से टीवी रखे जाने वाले ड्रॉइंग रूम का माहौल बोझिल नही हो गया है? इस बीच मीडिया ने सबसे पहला स्थान हासिल करने की दौड़ में क्या कुछ खो भी दिया है, ये बहुत चिंतन का विषय है।

बचपन में माएं बच्चों को पुलिस से डराती थीं, और बड़े होकर हम दोस्तों में बात होती रही की पुलिस की ना दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी। यकीन मानिए मीडिया की हालत आज इससे बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं है। नूपुर और दुर्रानी परिवार ने जो बात मीडिया के सामने चीख-चीख कर कही (उसे गैर-ज़िम्मेदार बताया), आम लोग इससे बहुत अलग राय नहीं रखते।

राजेश तलवार जेल से रिहा होने के बाद साईं बाबा के मन्दिर पूजा करने जा रहे थे। साथ ही तस्वीरों में ये भी दिखा की एक पिता अपने दो बच्चों को कैमरों से बचाने की कोशिश कर रहा है। मैं हैरान हूं ये सोचकर की क्या मीडिया की हालत इतनी ख़राब हो गई है? क्या मीडिया पर आम लोगों के विश्वास का स्तर यहाँ तक पहुँच गया है? भारत में चौथे स्तम्भ के लिए ये अब एक ऐसा सुलगता सवाल है जो उसकी नियति भी तय करेगा?

मीडिया ये भूल गया है की वो पहरेदार भर की भूमिका निभा सकता है, न्यायलय की नहीं, वो भूल गया है की उसका दायित्व दर्पण बनकर झूठ और सच के सामने खड़े होने भर का है ताकि समाज उसके हिसाब से अपनी राय बना सके। मीडियाकर्मी या संस्थाएं आगे निकलने की आपाधापी में घटनाओं में सच और झूठ के रंग भरने की कोशिश करते हैं और इस क्रम में अपनी विश्वसनीयता खोकर समाज में इसे अस्पृश्य का दर्जा हासिल करते जा रहे हैं।

'आरुषि-मर्डर केस' का सच चाहे जो भी हो आम लोगों में इस बात की राहत ज़्यादा दिख रही है की चलो इस न्यूज़ से शायद अब छुटकारा मिला। इस देश में जहाँ चुनाव, महंगाई, सरकार बचने-गिरने की कवायद किसी तरह चैनल और अखबारों में जगह बना पाते हों (जिसका हम सबकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ने वाला है), ज़ाहिर है लोग ख़बरों की बजाय सास-बहू और राखी सावंत के टॉक-शो देखना ज़्यादा पसंद करेंगे।

मीडिया क्या बेचना या परोसना चाहती है, ये सब ज्यादातर मीडिया के एयर-कंडीशंड कमरों में तय हो जाते हैं, क्योंकि बुनियादी तौर पर रिपोर्टिंग का स्तर गिर रहा है। रिपोर्टर मैदान पर जाकर हकीकत जानने के बजाय फ़ोन पर रिपोर्टिंग की ख़बर बटोरते हैं, स्टोरी फाइल करते हैं और दिहाड़ी पूरी हो जाती है। इसलिए, किस रिपोर्टर की कितनी बड़ी शख्सियत से जान पहचान है ये मीडियाकर्मियों के बीच बातचीत का अहम् मुद्दा होता है। बुनियादी स्तर पर किस रिपोर्टर को विषयों की कितनी समझ है इसकी ज़रूरत कभी-कभी ही समझी जाती है, लेकिन वक्त आ गया है ओपिनियन-मेकर माना जाने वाला मीडिया आत्ममंथन शुरू कर दे वरना जिस समाज के सामने अपनी खबरें बेचकर वो जीविका चलाते हैं उस समाज से दरकिनार कर दिए जाएंगे।

जर्मन चिन्तक-नाटककार और कवि बेर्टोल्ट ब्रेख्त ने ये कविता 1940 के दशक में लिखी थी जिसका उन्वान था 'हॉलीवुड' जो आज भारतीय मीडिया के लिए बहुत सटीक बैठती है:

रोज़ाना रोटी कमाने की खातिर
मैं बाज़ार जाता हूं
जहाँ झूठ खरीदे जाते हैं
उम्मीद के साथ
मैं विक्रेताओं के बीच अपनी जगह बना लेता हूं ...

निशाना राठौर की लीग में...

निशाना राठौर की लीग में...
विमल मोहन
नई दिल्ली, बुधवार, जुलाई 9, 2008

आज आप किसी भी भारतीय खेलप्रेमी से अगर सवाल करें कि इस बार बीजिंग ओलम्पिक में कौन भारतीय पदक जीत सकता है... शायद ज्यादातर लोग राज्यवर्धन राठौर के नाम के साथ जाना चाहेंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं, भारत सहित दुनिया-भर के निशानेबाजों के सर्किट में एक और भारतीय नाम को बड़े अदब से लिया जाने लगा है - वह है दिल्ली के डबल ट्रैप शूटर रोंजन सोढी का।

यूं तो रोंजन पिछले दो साल से कमाल का निशाना साध रहे हैं, लेकिन पिछला महीना उनके लिए लाजवाब साबित हुआ। बेलग्रेड में हुए वर्ल्ड कप में उन्होंने न सिर्फ़ अपने रोल मॉडल राज्यवर्धन राठौर को पछाड़ा, बल्कि डबल ट्रैप में दो वर्ल्ड रिकॉर्ड भी कायम किए। रोंजन ने क्वालिफाइंग में 147/150 और फाइनल में 194/200 का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर दुनिया-भर के निशानेबाजों को हैरान कर दिया। ओलम्पियन मनशेर सिंह भी रोंजन की तारीफ़ के पुल बांधते नही थकते, और कहते हैं, राठौर ने ओलम्पिक पदक जीतकर भारतीय शूटिंग को एक अलग पायदान पर पहुंचाया था, अब रोंजन इसे एक स्तर ऊपर ले गए हैं, क्योंकि इससे पहले क्ले-शूटिंग में भारतीय निशानेबाजों ने पदक तो जीते हैं, लेकिन वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का कारनामा पहली बार हुआ है।

रोंजन ने वर्ल्ड कप में पहली बार स्वर्ण पदक जीता है. उनकी खुशी इसलिए भी चौगुनी हो गई है, क्योंकि उन्होंने प्रतियोगिता में करीब एक दशक पहले रिकॉर्ड कायम करने वाले इटली के डैनिएल डि स्पिंगो, 2000 सिडनी ओलम्पिक के स्वर्ण पदक विजेता रिचर्ड फॉल्ड्स और राठौर जैसे दिग्गजों के दिल पर अपना सिक्का चला दिया। जीत के बाद राठौर और स्पिंगो जैसे दिग्गजों की शाबाशी जीतना रोंजन के लिए अपने आप में किसी पदक से कम नहीं है।

रोंजन को मलाल है तो इस बात का, कि वह इस बार अब तक बीजिंग ओलम्पिक के लिए कोटा स्थान हासिल नहीं कर पाए हैं, लेकिन उनकी इस जीत के बाद से भारतीय शूटिंग संघ और भारतीय ओलम्पिक संघ ज़ोर-शोर से उनके लिए लॉबिन्ग कर रहा है, ताकि उन्हें बीजिंग के लिए हार्डशिप कोटा मिल जाए। इन्हें लगता है, अगर रोंजन को राठौर के साथ डबल ट्रैप में ओलम्पिक में उतरने का मौका मिला तो भारत के पदक जीतने की उम्मीद बढ़ जाएंगी। ख़ुद रोंजन को लगता है कि उन्हें बीजिंग में अपनी गन को आजमाने का मौका मिल जाएगा। वह कहते हैं, एशिया में इस बार सिर्फ़ चार एशियाई खिलाड़ियों को कोटा मिला है - एथेंस के स्वर्ण पदक विजेता सऊदी अरब के अहमद अल मख्तूम और रजत पदक विजेता राज्यवर्धन राठौर, चीन के हु बिनयुआन और पैन किआंग को - जबकि यूरोप से आठ खिलाड़ियों ने कोटा स्थान हासिल किया है।

इसीलिए रोंजन को पूरा भरोसा है कि इस महीने के तीसरे हफ्ते के शुरू होने से पहले वह भी कोटा स्थान हासिल कर लेंगे और राठौर की लीग में आकर निशाना लगाएंगे। अचानक ओलम्पिक प्रतियोगिता में उतरकर निशाना न साधना पड़े, इसलिए अभ्यास के लिए वह ऑस्ट्रेलिया का रुख कर चुके हैं, जहां वह राठौर के पूर्व कोच रसेल मार्क के साथ कोचिंग कर रहे हैं।

दरअसल राठौर और रोंजन में इस वक्त कई समानताएं दिख रही हैं। एथेंस के पदक से पहले राठौर भी इसी तरह लाजवाब फॉर्म में थे, उन्होंने भी पहले निकोसिया में वर्ल्ड चैम्पियनशिप का पदक जीतने का कारनामा किया था और कोच रसेल मार्क ने उन्हें भी कामयाबी के गुर बताए थे। ये सभी संकेत भारतीय शूटिंग के चमकते भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं।

भारतीय मीडिया भले ही रोंजन के नाम को खास तवज्जो नहीं दे रहा हो, मगर विदेशी मीडिया, खासकर चीन और ऑस्ट्रलियाई पत्रकार, रोंजन को पदक का बहुत मज़बूत दावेदार मान रहे हैं। बेलग्रेड में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के बाद चीन के एक संवाददाता रेन यान ने प्रतिष्ठित अखबार 'पीपल्स डेली' के लिए भारत में रोंजन का लंबा इंटरव्यू किया। रेन यान कहते हैं कि चीन में सभी भारतीय शूटरों को पदक का मज़बूत दावेदार माना जा रहा है। ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन के माइकेल कोगैन की राय भी इससे ज्यादा अलग नहीं है। उनका मानना है कि भारतीय शूटिंग टीम इस बार इतिहास कायम कर सकती है और अगर मौका मिला तो खेलप्रेमी यह इतिहास रोंजन के 12 बोर के बेरेटा गन के ज़रिये देख सकेंगे।

जर्सी पिचानवे हज़ार की...

जर्सी पिचानवे हज़ार की...
विमल मोहन
नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, जून 12, 2008

इन दिनों जब आप टेलीविजन से चिपककर यूरो कप के मुकाबलों का लुत्फ़ उठा रहे होंगे या फिर यह जानने की कोशिश कर रहे होंगे कि 20-20 आईपीएल के कौन-से सितारे वन-डे में भी अपना कमाल दिखाते हैं, चंडीगढ़ के सेक्टर 18 के घास के हॉकी मैदान पर सिक्स-अ-साइड हॉकी टूर्नामेंट कुछ चुनिंदा दर्शकों के जुनून की वजह बना हुआ है।

यह टूर्नामेंट भारतीय हॉकी के लिए कई वजहों से बेहद ख़ास है। चंडीगढ़ में घास के हॉकी मैदान पर चल रहे (8-12 जून तक) चल रहे सिक्स-अ-साइड हॉकी टूर्नामेंट में हर रोज़ करीब हज़ार ख़ास दर्शक अपनी टीमों का हौसला बढ़ाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। यहां हॉकी के दिग्गज कोच रिक चार्ल्सवर्थ भी होते हैं और होते हैं सैकड़ों शोर मचाते दर्शक... लेकिन इन सबमें चंडीगढ़ की 11 साल की पारुल की तालियों की अलग ही आवाज़ होती है। वह भारतीय टीम के खिलाड़ी राजपाल सिंह की और उनकी इंडियन आयल टीम की बहुत बड़ी फैन लगती है।

टूर्नामेंट से पहले जब ओलम्पियन प्रभजोत सिंह, दीपक ठाकुर और राजपाल जैसे खिलाड़ियों की एक-एक जर्सी पर बोली लगी, उस वक्त होटल में 11 साल की पारुल की मौजूदगी ने खिलाड़ी और टूर्नामेंट आयोजकों का जोश दूना कर दिया। चंडीगढ़ के एनपीएस स्कूल की पारुल, राजपाल की उस जर्सी के लिए 25-30000 रुपये की बोली लगाने का इरादा लेकर आई थी, जिसे पहनकर राजपाल ने 2007 के चेन्नई एशिया कप के फाइनल में कोरिया के ख़िलाफ़ दो गोल किए थे (और खिताब भारत ने जीता था)। यह और बात है कि वह जर्सी एक ऐसे एनआरआई फैन के हाथ लगी, जो सिडनी से आया था। इस हॉकी फैन का नाम भी राजपाल है, और उसने 2001 में होबार्ट में हुए जूनियर वर्ल्ड कप के दौरान राजपाल सिंह को खेलते देखा था (भारत ने वहां भी खिताब अपने नाम किया था)।

ओलम्पियन दीपक ठाकुर मौजूद नहीं थे, फिर भी उनकी टी-शर्ट 45000 रुपये में फैन के हाथों में गई तो प्रभजोत की जर्सी 95000 रुपये में बिकी। बाद में जब इन तीनों हॉकी फैन से पूछा गया तो उन्होंने कहा, वे इन टी-शर्ट की कीमत दो लाख से लेकर 10 लाख तक लगाने को तैयार थे। उससे भी बड़ी बात यह है कि जब हॉकी को लेकर आम लोगों का जोश ठंडा पड़ता दिख रहा है और यह राष्ट्रीय खेल भारत में दम तोड़ता नज़र आता है, ये फैन, खेल और खिलाड़ी के लिए संजीवनी साबित हो सकते हैं।

इस नीलामी से ठीक पहले धरम सिंह मेमोरियल हॉकी टूर्नामेंट के सचिव ओलम्पियन सुखबीर सिंह गिल, राजपाल और प्रभजोत सिंह के साथ होटल के बाहर लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे थे। उनके चेहरों पर कहीं न कहीं एक डर ज़रूर था... प्रभजोत बार-बार अपने एक हज़ार की लाल शर्ट की बांह पकड़ रहे थे और यह समझना मुश्किल नही था कि वह किसी अहम मैच से पहले की हालत में हैं और नर्वस हैं।

दरअसल भारतीय टीम के ओलम्पिक में क्वालिफाई न कर पाने की वज़ह से इस बार टूर्नामेंट का आयोजन बेहद मुश्किल लग रहा था। सिर्फ़ तीन लाख रुपये के बजट वाले इस सिक्स-अ-साइड टूर्नामेंट के लिए थोड़े पैसे लगाने को भी कोई स्पॉन्सर तैयार नहीं था। ओलम्पियन सुखबीर सिंह गिल, राजपाल कई धन-कुबेरों का दरवाजा खटखटा चुके थे। तब राजपाल ने अपनी जीत की सुनहरी यादों की नीलामी की बात सोची। इन खिलाड़ियों ने सोचा - इससे न सिर्फ़ टूर्नामेंट का छठे साल भी आयोजन मुमकिन हो पाएगा, बल्कि सरकार और दूसरे प्रायोजकों को भी हॉकी की हकीकत पता चलेगी।

टीम इंडिया के मशहूर फॉरवर्ड दीपक ठाकुर हॉकी के इस दर्द से अच्छी तरह वाकिफ हैं। वह ख़ुद भी इस दर्द में शरीक हो गए और भारतीय हॉकी से जुड़ी पहली नीलामी का हिस्सा बन गए। राजपाल कहते हैं कि यह टूर्नामेंट यूरोप में बेहद मशहूर है। ऑफ़ सीज़न में यूरोप के इन्डोर स्टेडियमों में इस तरह के टूर्नामेंटों का जलवा अपने शबाब पर होता है। खासकर, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देशों में यह काफी लोकप्रिय है। मशहूर ऑस्ट्रेलियाई कोच रिक चार्ल्सवर्थ मानते हैं कि इन्डोर हॉकी का जर्मनी की टीम पर अच्छा-खासा असर पडा है। यही वजह है कि जर्मनी की टीम पिछले दो बार से इन्डोर और आउटडोर दोनों तरह की हॉकी में वर्ल्ड चैम्पियन है। चार्ल्सवर्थ मानते हैं कि अगर योजना बनाकर भारत में इस तरह की हॉकी (टर्फ पर) खेली जाए तो इसका फायदा भारत को भी पहुंच सकता है, लेकिन उनका मानना है कि भारतीय हॉकी अब भी ढुलमुल रवैये से हटा नहीं है।

ओलम्पियन प्रभजोत सिंह इस तरह की छोटे पैक वाली हॉकी (इन्डोर हॉकी के नियमों के साथ 30-40 मिनट में छोटे मैदान पर खेली जाने वाली हॉकी) का रणनीतिक फायदा देखते हैं। उनके मुताबिक इस तरह की हॉकी में स्पीड बहुत ज़्यादा होती है, इसलिए यह भारतीय खिलाड़ियों को यूरोपीय शैली से निपटने में मदगार साबित हो सकती है, इसलिए उन्होंने इस टूर्नामेंट को बचाने की कोशिश की है।

ऐसा नहीं है कि टी-शर्ट की नीलामी नई बात है। फ़ुटबाल स्टार माराडोना और जॉर्ज बेस्ट की टी-शर्ट से लेकर ब्योन बोर्ग जैसे टेनिस स्टार के स्पोर्ट्स गियर खूब महंगे दामों में बिकने की वजह से शोहरत कमा चुके हैं, लेकिन भारतीय हॉकी के इतिहास में यह अनूठी बात है... और शायद इसलिए कुछ परम्परावादी खिलाड़ियों को खटकने भी लगी।

ओलम्पिक खेलों में दो बार भारतीय टीम के कप्तान रह चुके परगट सिंह नीलामी को सही तो नहीं मानते, पर इन खिलाड़ियों की सराहना भी करते हैं... लेकिन सुखबीर गिल कहते हैं, 'इसमें क्या बुराई है। आईपीएल के दौरान तो क्रिकेटरों की खुलेआम बोलियां लगी। हम तो कम से कम इनकी जर्सियों को बेचकर एक टूर्नामेंट में जान फूंकने की कोशिश कर रहे हैं...'

राजबीर सुखबीर की बातों से उतना ही इत्तफाक रखते हैं और कहते हैं, 'भाई साहब, अब छिपाने से कुछ नहीं होने वाला। लोगों को सच मालूम होना चाहिए। तभी कुछ ठीक होगा...' राजबीर की बातों में जर्मन चिन्तक-कवि-नाटककार बेरटोल्ट ब्रेष्ट की आवाज़ (सच हमें जोड़ता है) सुनाई देती है। ब्रेष्ट की यह कविता कहती है...

'भाइयों यह किस बारे में है...

मैं तुमसे साफ-साफ कहूंगा...

कि जिन मुश्किल हालात में हम फंसे हैं...

उनसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नही है...'

दोस्तों, इसे दृढ़ता से स्वीकारो और स्थिति का सामना करो... जब तक...

वॉर्न का दर्शन : जीत का दर्शन

वॉर्न का दर्शन : जीत का दर्शन
विमल मोहन
नई दिल्ली, शनिवार, मई 31, 2008
'अत्तदीपा विहरथ' ...बौद्ध दर्शन में इस सूक्ति का मतलब है अपना दीपक ख़ुद बनो यानी अपना रास्ता स्वयं बनाओ। पता नहीं शेन वॉर्न का कभी बौद्ध दर्शन से वास्ता पड़ा या नहीं, लेकिन सेमीफाइनल से पहले मुम्बई को एक मैच में हराने के बाद उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि उनकी टीम का नारा है, 'अपना रास्ता ख़ुद बनाएं, हो सकता है आपको मैच में सिर्फ़ एक या तीन गेंदों के सामना करने का मौका मिले, लेकिन अगर आप मौके का सही फायदा उठाते हैं तो आप हीरो बन सकते हैं।'

शेन वॉर्न ने अपनी टीम में ये बात घुट्टी की तरह पिला दी थी इसलिए आईपीएल की सबसे सस्ती टीम आज एक बेशकीमती टीम बनकर सबके सामने आई है और उम्मीद की जा रही है कि वॉर्न के रॉयल सैनिक अगले सत्र में दूसरी सभी टीमों की नज़रों में छाये रहेंगे। इन सबका श्रेय टीम के मालिक 'इमर्जिंग मीडिया' को भी देना पड़ेगा, जिन्होंने टीम चुनते वक्त सही तरीके से इस पर काम किया और बड़े नामों पर जाने के बजाए खिलाड़ियों को उनके फॉर्म के आधार पर चुनने पर ज़ोर दिया।

हालांकि टीम जब आईपीएल में अपना पहला मुकाबला डेल्ही डेयरडेविल्स से हार गई तो टीम पर फब्तियां कसी गईं और इसके कर्ता-धर्ता भी सकते में आ गए। 'इमर्जिंग मीडिया' के चेयरमैन मनोज बाडाले कहते हैं, 'अगर मैं यह कहूं कि हमें अपनी टीम को लेकर कोई शको-शुबहा नहीं था तो मैं ग़लत कहूंगा। टीम चुनते वक्त हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि शेन वॉर्न टीम के लिए राइट च्वाइस हैं, लेकिन दिल्ली से हार के बाद हमने टीम की मीटिंग की और उनसे कहा कि वो हार से नहीं घबराएं। फिर मैदान पर टीम में जोश भरने का काम वॉर्न ने बखूबी निभाया।'

टीम के अन्दर और बाहर सभी मानते हैं की टीम में सीनियर हों या जूनियर सभी खिलाड़ी वॉर्न की खूब इज्ज़त करते हैं। इसकी बड़ी वज़ह सिर्फ़ उनका अपना कद नहीं, बल्कि उनके संवाद कायम करने की गज़ब की काबिलियत भी है। यही वज़ह है कि टीम में ग्रेम स्मिथ से लेकर रविन्द्र जडेजा जैसे खिलाड़ी भी वॉर्न के सामने अपनी बात रख सकते हैं।

क्रिकेट इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक, इस खेल में बल्लेबाजों को बिगड़ैल नवाब (पैम्पर्ड एरिस्टोक्रेट) माना जाता है और कप्तान चुनते वक्त अधिकारी खेल के आरंभिक इतिहास से लेकर अब तक अक्सर गेंदबाजों के ख़िलाफ़ फैसला लेते रहे हैं। अपनी किताब 'अ कॉर्नर ऑफ द फॉरेन फील्ड' में रामचंद्र गुहा एक दिलचस्प वाकये का ज़िक्र करते हैं।
जब 1910 के दशक में 'द क्वार्द्रन्गुलर' टूर्नामेंट में ' द हिंदूज' टीम की कप्तानी बांये हाथ के महान स्पिन गेंदबाज़ पल्वंकर बालू को कभी नहीं मिली और इसके लिए दलील दी जाती रही कि वो गेंदबाज़ हैं।

करीब सौ साल बाद भी ये सोच ज़्यादा नही बदली है। आईपीएल की आठ में से सात टीमों के कप्तान बल्लेबाज़ हैं। वॉर्न को हैम्पशायर और विक्टोरिया की टीमों की कप्तानी का अनुभव तो है, लेकिन वो ऑस्ट्रेलिया के कप्तान नहीं बन सके। ऐसे में राजस्थान रॉयल्स टीम की कप्तानी के लिए वॉर्न के नाम पर मुहर लगाना हिम्मत की बात थी।

राजस्थान रॉयल्स सहित कई दूसरी टीम के खिलाड़ी दबी जुबां में कहते हैं कि कई भारतीय कप्तानों और वॉर्न में एक बड़ा फर्क बेहतर संवाद कायम करने का ही है। राजस्थान रॉयल्स के सीईओ फ्रेज़र कैस्टैलिनो कहते हैं, 'दूसरे राउंड में टीम चुनते वक्त वॉर्न ने सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन पहले राउंड में भी हमने खिलाड़ियों के आंकडों को खूब जांचा परखा। हमने देखा कि हरेक खिलाड़ी ने कितने रन बनाए, किस औसत से रन बनाए, कितने शतक लगाए, खिलाड़ी का स्ट्राइक रेट क्या है..वगैरह-वगैरह। यही नहीं हमने टीम के कोच से पूछा और दूसरे कोच से भी इसकी जांच की इसलिए हमें भरोसा रहा कि जिन खिलाड़ियों को हमने चुना है उनमें काबिलियत है और वो टूर्नामेंट में ज़रूर चलेंगे।

वॉर्न की लीडरशिप में ये खूब चमके भी।' इसलिए दूसरी कई बड़ी और महंगी टीमों के सुपरस्टार नाम बड़े और दर्शन छोटे साबित हुए। दरअसल, एक और बड़ा फर्क नेतृत्व का रहा। दूसरी टीमों के कप्तान अगर मैदान पर तालमेल कायम करने में विफल रहे तो उनके मालिकों ने उनके काम को और मुश्किल कर दिया, लेकिन शायद ये आज बाज़ार की हकीकत है और किसी भी खेल की फितरत बन गई है।

चैंपियंस लीग में शानदार खेलने के बावजूद चेल्सी की टीम फाइनल मुकाबला पेनल्टी शूट आउट में हारी। मगर फिर भी अव्राम ग्रांट को कोच के पड़ से हाथ धोना पड़ा।यकीनन ऐसा आईपीएल में भी होगा, लेकिन अगली बार जब टीम चुनने की कयावाद होगी या टीम में बदलाव की बात की जाएगी तो राजस्थान रॉयल्स का उदाहरण ज़रूर सभी टीमों के लिए जीत तक पहुंचने का दर्शन साबित होगा।

Monday, May 12, 2008

शाहरुख़ के एसएमएस

'हार कर जीतनेवाले को बाजीगर कहते हैं'....जिस फ़िल्म में शाहरुख़ खान ये डायलॉग कहते हैं उस फ़िल्म में उनका किरदार निगेटिव है.....लेकिन आप किंग खान के किसी भी नाइट राइडर्स से बात करें तो वो कहते हैं...'कमाल का बन्दा है'.... क्रिकेट टीम के धुरंधरों को खेल-भावना का पाठ पढानेवाले इस बाजीगर ने अपनी टीम के दिल में घर बना लिया है.

आईपीएल के पहले दो मैचों में शानदार जीत के बाद जब कोलकाता नाइट राइडर्स को लगातार चार हार का सामना करना पडा तो इस टीम के बड़े समर्थक भी इसकी आलोचना करते नज़र आये. लेकिन कभी ख़ुद एक अच्छे खिलाड़ी रह चुके शाहरुख़ ने हार नही मानी. उन्होंने अपनी टीम के साथ एक बड़ी पार्टी की. पार्टी में सभी खिलाडियों को कॉम्पैक का एक-एक कंप्यूटर दिया और दुनिया की नज़रों में हार का जश्न मनाया. इस पार्टी में शाहरुख़ ने अपनी टीम का जैसे मनोबल बढाया वो लाजवाब है.

शाहरुख़ ने अपनी टीम से कहा की अगर आप हारकर उठ नही सकते तो आप चैम्पियन नही हैं. किंग खान ने अपने बेटे का उदाहरण देते हुए कहा ".. मैं नही चाहता हूँ कि आर्यन ( बेटा) कभी मार खाकर घर आए...लेकिन ये भी सही है कि अगर वो मार नही खायेगा तो कभी चैम्पियन नही बनेगा."

शाहरुख़ ने अपनी टीम में ये विश्वास भर दिया कि वो चैम्पियन हैं....और हारना एक सहज प्रक्रिया है... अगर आप इसे बिजनेस का भी नाम देना चाहते हैं... तो बिजनेस का भारत में ये अनूठा तरीका है..... शाहरुख़ कहते हैं " मुझे हार पसंद नही लेकिन मेरा बेटा अगर हार जाता है तो मैं उसे घर से निकाल नही देता. मैं उसे ट्रेन करता हूँ कि आगे वो जीतकर आए."

हर मैच से पहले शाहरुख़ टीम के सभी खिलाड़ियों को लंबे-लंबे एसएमएस करते हैं. लेकिन संदेश की इस प्रक्रिया में उनका मकसद टीम का हौसला बढ़ाने की कोशिश भर होती है. वो टीम पर दबाव नही डालते. वो खिलाडियों से खुलकर कहते हैं "आपको एक्टिंग नही आती, मुझे क्रिकेट नही आती. क्रिकेट खेलना आपका काम है. लेकिन आप मैच हार नही मानने जज्बे के साथ ही खेलें. "

कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के आकाश चोपडा कहते हैं कि बन्दे में बहुत दम है. आकाश कहते हैं की टीम के सभी खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ शाहरुख़ की लीडरशिप और उनकी कमाल की खेल भावना के कायल हैं. शाहरुख़ अपनी टीम से बार-बार कहते हैं कि अब वो टीम के साथ हैं...इसलिए जीतेंगे तो टीम की तरह और डूबेंगे तो साथ-साथ.

आईपीएल शुरू होने से पहले ही जब शाहरुख़ ने कहा कि अगर वो कामयाब नही रहे तो पहले साल के बाद वो प्रीमियर लीग का साथ छोड़ देंगे. इसे लेकर विवाद तो हुआ लेकिन कम से कम शाहरुख़ के ईमानदारी से अपनी बात सबके सामने रखने की दाद देनी होगी. ये एक पारदर्शी तरीका है जब किसी कम्पनी के मालिक ने खेल शुरू होने से पहले ही अपनी टीम के सामने अपना लक्ष्य साफ कर दिया.

शाहरुख़ अपनी टीम से बात करते वक्त खिलाडियों को अहसास कराते हैं कि वो बहुत ख़ास हैं...और उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि वो उनकी टीम के लिए खेल रहे हैं... शाहरुख़ की टीम पहले प्रीमियर लीग का खिताब जीते या नही....उनकी टीम के लिए उनसे बड़ा चैम्पियन कोई नही.