अकाल और उसके बाद
-नागार्जुन
कई दिनों तक चूल्हा रोया,
चक्की रही उदास/
कई दिनों तक काली कुतिया सोयी उसके पास/
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त/
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.
दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद/
धुआं उठा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद/
चमक उठीं घर भर की आंखें कई दिनों के बाद/
कौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद.
कविता में बिम्ब का इतना सुन्दर और संजीदा इस्तेमाल बाबा नागार्जुन के ही बस का था. वाह अद्भुत!
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1 comment:
Bahut hi sudar bimb prayog. Anukarneey.
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