वॉर्न का दर्शन : जीत का दर्शन
विमल मोहन
नई दिल्ली, शनिवार, मई 31, 2008
'अत्तदीपा विहरथ' ...बौद्ध दर्शन में इस सूक्ति का मतलब है अपना दीपक ख़ुद बनो यानी अपना रास्ता स्वयं बनाओ। पता नहीं शेन वॉर्न का कभी बौद्ध दर्शन से वास्ता पड़ा या नहीं, लेकिन सेमीफाइनल से पहले मुम्बई को एक मैच में हराने के बाद उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि उनकी टीम का नारा है, 'अपना रास्ता ख़ुद बनाएं, हो सकता है आपको मैच में सिर्फ़ एक या तीन गेंदों के सामना करने का मौका मिले, लेकिन अगर आप मौके का सही फायदा उठाते हैं तो आप हीरो बन सकते हैं।'
शेन वॉर्न ने अपनी टीम में ये बात घुट्टी की तरह पिला दी थी इसलिए आईपीएल की सबसे सस्ती टीम आज एक बेशकीमती टीम बनकर सबके सामने आई है और उम्मीद की जा रही है कि वॉर्न के रॉयल सैनिक अगले सत्र में दूसरी सभी टीमों की नज़रों में छाये रहेंगे। इन सबका श्रेय टीम के मालिक 'इमर्जिंग मीडिया' को भी देना पड़ेगा, जिन्होंने टीम चुनते वक्त सही तरीके से इस पर काम किया और बड़े नामों पर जाने के बजाए खिलाड़ियों को उनके फॉर्म के आधार पर चुनने पर ज़ोर दिया।
हालांकि टीम जब आईपीएल में अपना पहला मुकाबला डेल्ही डेयरडेविल्स से हार गई तो टीम पर फब्तियां कसी गईं और इसके कर्ता-धर्ता भी सकते में आ गए। 'इमर्जिंग मीडिया' के चेयरमैन मनोज बाडाले कहते हैं, 'अगर मैं यह कहूं कि हमें अपनी टीम को लेकर कोई शको-शुबहा नहीं था तो मैं ग़लत कहूंगा। टीम चुनते वक्त हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि शेन वॉर्न टीम के लिए राइट च्वाइस हैं, लेकिन दिल्ली से हार के बाद हमने टीम की मीटिंग की और उनसे कहा कि वो हार से नहीं घबराएं। फिर मैदान पर टीम में जोश भरने का काम वॉर्न ने बखूबी निभाया।'
टीम के अन्दर और बाहर सभी मानते हैं की टीम में सीनियर हों या जूनियर सभी खिलाड़ी वॉर्न की खूब इज्ज़त करते हैं। इसकी बड़ी वज़ह सिर्फ़ उनका अपना कद नहीं, बल्कि उनके संवाद कायम करने की गज़ब की काबिलियत भी है। यही वज़ह है कि टीम में ग्रेम स्मिथ से लेकर रविन्द्र जडेजा जैसे खिलाड़ी भी वॉर्न के सामने अपनी बात रख सकते हैं।
क्रिकेट इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक, इस खेल में बल्लेबाजों को बिगड़ैल नवाब (पैम्पर्ड एरिस्टोक्रेट) माना जाता है और कप्तान चुनते वक्त अधिकारी खेल के आरंभिक इतिहास से लेकर अब तक अक्सर गेंदबाजों के ख़िलाफ़ फैसला लेते रहे हैं। अपनी किताब 'अ कॉर्नर ऑफ द फॉरेन फील्ड' में रामचंद्र गुहा एक दिलचस्प वाकये का ज़िक्र करते हैं।
जब 1910 के दशक में 'द क्वार्द्रन्गुलर' टूर्नामेंट में ' द हिंदूज' टीम की कप्तानी बांये हाथ के महान स्पिन गेंदबाज़ पल्वंकर बालू को कभी नहीं मिली और इसके लिए दलील दी जाती रही कि वो गेंदबाज़ हैं।
करीब सौ साल बाद भी ये सोच ज़्यादा नही बदली है। आईपीएल की आठ में से सात टीमों के कप्तान बल्लेबाज़ हैं। वॉर्न को हैम्पशायर और विक्टोरिया की टीमों की कप्तानी का अनुभव तो है, लेकिन वो ऑस्ट्रेलिया के कप्तान नहीं बन सके। ऐसे में राजस्थान रॉयल्स टीम की कप्तानी के लिए वॉर्न के नाम पर मुहर लगाना हिम्मत की बात थी।
राजस्थान रॉयल्स सहित कई दूसरी टीम के खिलाड़ी दबी जुबां में कहते हैं कि कई भारतीय कप्तानों और वॉर्न में एक बड़ा फर्क बेहतर संवाद कायम करने का ही है। राजस्थान रॉयल्स के सीईओ फ्रेज़र कैस्टैलिनो कहते हैं, 'दूसरे राउंड में टीम चुनते वक्त वॉर्न ने सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन पहले राउंड में भी हमने खिलाड़ियों के आंकडों को खूब जांचा परखा। हमने देखा कि हरेक खिलाड़ी ने कितने रन बनाए, किस औसत से रन बनाए, कितने शतक लगाए, खिलाड़ी का स्ट्राइक रेट क्या है..वगैरह-वगैरह। यही नहीं हमने टीम के कोच से पूछा और दूसरे कोच से भी इसकी जांच की इसलिए हमें भरोसा रहा कि जिन खिलाड़ियों को हमने चुना है उनमें काबिलियत है और वो टूर्नामेंट में ज़रूर चलेंगे।
वॉर्न की लीडरशिप में ये खूब चमके भी।' इसलिए दूसरी कई बड़ी और महंगी टीमों के सुपरस्टार नाम बड़े और दर्शन छोटे साबित हुए। दरअसल, एक और बड़ा फर्क नेतृत्व का रहा। दूसरी टीमों के कप्तान अगर मैदान पर तालमेल कायम करने में विफल रहे तो उनके मालिकों ने उनके काम को और मुश्किल कर दिया, लेकिन शायद ये आज बाज़ार की हकीकत है और किसी भी खेल की फितरत बन गई है।
चैंपियंस लीग में शानदार खेलने के बावजूद चेल्सी की टीम फाइनल मुकाबला पेनल्टी शूट आउट में हारी। मगर फिर भी अव्राम ग्रांट को कोच के पड़ से हाथ धोना पड़ा।यकीनन ऐसा आईपीएल में भी होगा, लेकिन अगली बार जब टीम चुनने की कयावाद होगी या टीम में बदलाव की बात की जाएगी तो राजस्थान रॉयल्स का उदाहरण ज़रूर सभी टीमों के लिए जीत तक पहुंचने का दर्शन साबित होगा।
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