जर्सी पिचानवे हज़ार की...
विमल मोहन
नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, जून 12, 2008
इन दिनों जब आप टेलीविजन से चिपककर यूरो कप के मुकाबलों का लुत्फ़ उठा रहे होंगे या फिर यह जानने की कोशिश कर रहे होंगे कि 20-20 आईपीएल के कौन-से सितारे वन-डे में भी अपना कमाल दिखाते हैं, चंडीगढ़ के सेक्टर 18 के घास के हॉकी मैदान पर सिक्स-अ-साइड हॉकी टूर्नामेंट कुछ चुनिंदा दर्शकों के जुनून की वजह बना हुआ है।
यह टूर्नामेंट भारतीय हॉकी के लिए कई वजहों से बेहद ख़ास है। चंडीगढ़ में घास के हॉकी मैदान पर चल रहे (8-12 जून तक) चल रहे सिक्स-अ-साइड हॉकी टूर्नामेंट में हर रोज़ करीब हज़ार ख़ास दर्शक अपनी टीमों का हौसला बढ़ाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। यहां हॉकी के दिग्गज कोच रिक चार्ल्सवर्थ भी होते हैं और होते हैं सैकड़ों शोर मचाते दर्शक... लेकिन इन सबमें चंडीगढ़ की 11 साल की पारुल की तालियों की अलग ही आवाज़ होती है। वह भारतीय टीम के खिलाड़ी राजपाल सिंह की और उनकी इंडियन आयल टीम की बहुत बड़ी फैन लगती है।
टूर्नामेंट से पहले जब ओलम्पियन प्रभजोत सिंह, दीपक ठाकुर और राजपाल जैसे खिलाड़ियों की एक-एक जर्सी पर बोली लगी, उस वक्त होटल में 11 साल की पारुल की मौजूदगी ने खिलाड़ी और टूर्नामेंट आयोजकों का जोश दूना कर दिया। चंडीगढ़ के एनपीएस स्कूल की पारुल, राजपाल की उस जर्सी के लिए 25-30000 रुपये की बोली लगाने का इरादा लेकर आई थी, जिसे पहनकर राजपाल ने 2007 के चेन्नई एशिया कप के फाइनल में कोरिया के ख़िलाफ़ दो गोल किए थे (और खिताब भारत ने जीता था)। यह और बात है कि वह जर्सी एक ऐसे एनआरआई फैन के हाथ लगी, जो सिडनी से आया था। इस हॉकी फैन का नाम भी राजपाल है, और उसने 2001 में होबार्ट में हुए जूनियर वर्ल्ड कप के दौरान राजपाल सिंह को खेलते देखा था (भारत ने वहां भी खिताब अपने नाम किया था)।
ओलम्पियन दीपक ठाकुर मौजूद नहीं थे, फिर भी उनकी टी-शर्ट 45000 रुपये में फैन के हाथों में गई तो प्रभजोत की जर्सी 95000 रुपये में बिकी। बाद में जब इन तीनों हॉकी फैन से पूछा गया तो उन्होंने कहा, वे इन टी-शर्ट की कीमत दो लाख से लेकर 10 लाख तक लगाने को तैयार थे। उससे भी बड़ी बात यह है कि जब हॉकी को लेकर आम लोगों का जोश ठंडा पड़ता दिख रहा है और यह राष्ट्रीय खेल भारत में दम तोड़ता नज़र आता है, ये फैन, खेल और खिलाड़ी के लिए संजीवनी साबित हो सकते हैं।
इस नीलामी से ठीक पहले धरम सिंह मेमोरियल हॉकी टूर्नामेंट के सचिव ओलम्पियन सुखबीर सिंह गिल, राजपाल और प्रभजोत सिंह के साथ होटल के बाहर लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे थे। उनके चेहरों पर कहीं न कहीं एक डर ज़रूर था... प्रभजोत बार-बार अपने एक हज़ार की लाल शर्ट की बांह पकड़ रहे थे और यह समझना मुश्किल नही था कि वह किसी अहम मैच से पहले की हालत में हैं और नर्वस हैं।
दरअसल भारतीय टीम के ओलम्पिक में क्वालिफाई न कर पाने की वज़ह से इस बार टूर्नामेंट का आयोजन बेहद मुश्किल लग रहा था। सिर्फ़ तीन लाख रुपये के बजट वाले इस सिक्स-अ-साइड टूर्नामेंट के लिए थोड़े पैसे लगाने को भी कोई स्पॉन्सर तैयार नहीं था। ओलम्पियन सुखबीर सिंह गिल, राजपाल कई धन-कुबेरों का दरवाजा खटखटा चुके थे। तब राजपाल ने अपनी जीत की सुनहरी यादों की नीलामी की बात सोची। इन खिलाड़ियों ने सोचा - इससे न सिर्फ़ टूर्नामेंट का छठे साल भी आयोजन मुमकिन हो पाएगा, बल्कि सरकार और दूसरे प्रायोजकों को भी हॉकी की हकीकत पता चलेगी।
टीम इंडिया के मशहूर फॉरवर्ड दीपक ठाकुर हॉकी के इस दर्द से अच्छी तरह वाकिफ हैं। वह ख़ुद भी इस दर्द में शरीक हो गए और भारतीय हॉकी से जुड़ी पहली नीलामी का हिस्सा बन गए। राजपाल कहते हैं कि यह टूर्नामेंट यूरोप में बेहद मशहूर है। ऑफ़ सीज़न में यूरोप के इन्डोर स्टेडियमों में इस तरह के टूर्नामेंटों का जलवा अपने शबाब पर होता है। खासकर, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देशों में यह काफी लोकप्रिय है। मशहूर ऑस्ट्रेलियाई कोच रिक चार्ल्सवर्थ मानते हैं कि इन्डोर हॉकी का जर्मनी की टीम पर अच्छा-खासा असर पडा है। यही वजह है कि जर्मनी की टीम पिछले दो बार से इन्डोर और आउटडोर दोनों तरह की हॉकी में वर्ल्ड चैम्पियन है। चार्ल्सवर्थ मानते हैं कि अगर योजना बनाकर भारत में इस तरह की हॉकी (टर्फ पर) खेली जाए तो इसका फायदा भारत को भी पहुंच सकता है, लेकिन उनका मानना है कि भारतीय हॉकी अब भी ढुलमुल रवैये से हटा नहीं है।
ओलम्पियन प्रभजोत सिंह इस तरह की छोटे पैक वाली हॉकी (इन्डोर हॉकी के नियमों के साथ 30-40 मिनट में छोटे मैदान पर खेली जाने वाली हॉकी) का रणनीतिक फायदा देखते हैं। उनके मुताबिक इस तरह की हॉकी में स्पीड बहुत ज़्यादा होती है, इसलिए यह भारतीय खिलाड़ियों को यूरोपीय शैली से निपटने में मदगार साबित हो सकती है, इसलिए उन्होंने इस टूर्नामेंट को बचाने की कोशिश की है।
ऐसा नहीं है कि टी-शर्ट की नीलामी नई बात है। फ़ुटबाल स्टार माराडोना और जॉर्ज बेस्ट की टी-शर्ट से लेकर ब्योन बोर्ग जैसे टेनिस स्टार के स्पोर्ट्स गियर खूब महंगे दामों में बिकने की वजह से शोहरत कमा चुके हैं, लेकिन भारतीय हॉकी के इतिहास में यह अनूठी बात है... और शायद इसलिए कुछ परम्परावादी खिलाड़ियों को खटकने भी लगी।
ओलम्पिक खेलों में दो बार भारतीय टीम के कप्तान रह चुके परगट सिंह नीलामी को सही तो नहीं मानते, पर इन खिलाड़ियों की सराहना भी करते हैं... लेकिन सुखबीर गिल कहते हैं, 'इसमें क्या बुराई है। आईपीएल के दौरान तो क्रिकेटरों की खुलेआम बोलियां लगी। हम तो कम से कम इनकी जर्सियों को बेचकर एक टूर्नामेंट में जान फूंकने की कोशिश कर रहे हैं...'
राजबीर सुखबीर की बातों से उतना ही इत्तफाक रखते हैं और कहते हैं, 'भाई साहब, अब छिपाने से कुछ नहीं होने वाला। लोगों को सच मालूम होना चाहिए। तभी कुछ ठीक होगा...' राजबीर की बातों में जर्मन चिन्तक-कवि-नाटककार बेरटोल्ट ब्रेष्ट की आवाज़ (सच हमें जोड़ता है) सुनाई देती है। ब्रेष्ट की यह कविता कहती है...
'भाइयों यह किस बारे में है...
मैं तुमसे साफ-साफ कहूंगा...
कि जिन मुश्किल हालात में हम फंसे हैं...
उनसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नही है...'
दोस्तों, इसे दृढ़ता से स्वीकारो और स्थिति का सामना करो... जब तक...
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