गए तो...पर बेडा गर्क करने के बाद...
मिथकों में आपने गुप्त खजाने पर नागों के कुंडली मारकर बैठने की कहानियाँ ज़रूर सुनी होगी. पिछले एक हफ्ते में हिन्दुस्तान के खेल में दो ऐसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव आए हैं जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं .......
हॉकी संघ बर्खास्त हुई तो गिल को जाना पडा...लेकिन उससे भी बड़ी बात रही पहले हॉकी संघ के सचिव के जोथिकुमारन और वेटलिफ्टिंग संघ के सचिव बलबीर भाटिया ने सचिव का पद छोड़कर दोनों संघों को जैसे किसी श्राप से मुक्ति दे दी है...... जोथिकुमारन १५ साल बाद और बलबीर भाटिया ने करीब एक दशक बाद ओलिम्पिक में पदक जीतने वाले खेलों का पिंड छोड़ा....
सिर्फ़ पाँच साल पहले चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट के पहले मैच में भारतीय टीम हौलैंड के ख़िलाफ़ पहले 60 मिनट तक 3-0 की बढ़त बना कर मैच पर हावी नज़र आ रही थी....लेकिन आख़िरी 7-8 मिनट में 4 गोल ठोककर हौलैंड ने भारत को आखिरकार 4-3 से हरा दिया....फिर भी टीम इंडिया ने लंबे समय बाद दुनिया के कई दिग्गज कोच को खूब प्रभावित किया...यहाँ तक की खिताब विजेता हौलैंड के कोच जूस्ट बल्लार्ट ने खुलकर कहा की भारतीय टीम उनसे बेहतर थी...उन दिनों ऑउस्त्रेलिई कोच रिक चार्ल्सवर्थ टूर्नामेंट की कमेंट्री कर रहे थे.. भारतीय टीम ने उन्हें भी अपनी प्रतिभा का कायल कर दिया था. रिक चार्ल्सवर्थ तो भारतीय खिलाड़ी तेजबीर सिंह को टूर्नामेंट का सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी कह दिया ....
आज वही चार्ल्सवर्थ जब कहते हैं..." भारत में ये आम धारणा बनी हुई है के हमारी टीम में प्रतिभाओं की कमी नही है...सिर्फ़ कुछ चीज़ें ठीक कर लेने से सब ठीक हो जायेगा...मेरे ख्याल से ये ग़लत है...भारत में संभावनाएं हैं...लेकिन ये देखना होगा की इससे ठीक करने की इच्छा और इच्छा शक्ति है या नही..."
ये सुनकर किसी भी हॉकीप्रेमी का दिल बैठ सकता है...
पूर्व हॉकी कप्तान अशोक कुमार (ध्यानचंद के पुत्र) भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं...अशोक कुमार कहते हैं के टीम में अब कोई भी स्टार खिलाड़ी नही है...अब फिर से स्टार बनाने की ज़रूरत है. दरअसल पिछले १५ साल में हॉकी की ज्यादातर खबरें विवादों के ईर्द-गिर्द ही रही हैं....ज़ाहिर है युवा खिलाड़ियों की दिलचस्पी इसमें घटी ही है...इस दौरान शाम को हॉकी स्टिक लेकर मैदान पर जानेवालों खिलाड़ियों को किसी भी शहर,गांवों, मोहल्ले में उँगलियों पर गिना जा सकता है ....
नए खेल मंत्री डॉक्टर एमएस गिल या दूसरे खेल संघ के अधिकारी कैमरे पर आकर चाहे जो बयान दें... ओलिम्पिक संघ के कई वरिष्ठ अधिकारी कैमरा ऑफ होते ही ये भी कहते हैं की आप चाहे जो कहें भारत का राष्ट्रीय खेल अब क्रिकेट है...और क्रिकेट और दूसरे खेलों में बड़ा बन गया है....
वेटलिफ्टिंग की हालत हॉकी से बहुत अलग नही है....2000 के सिडनी ओलिम्पिक खेलों में जब पहली बार महिला वेटलिफ्टिंग को शामिल किया गया....तो संघ के सचिव बलबीर भाटिया पर टीम के चयन में धांधली का आरोप लगा.... लेकिन यमुनानगर की कर्णम मल्लेस्वरी ने इकलौता पदक (69 किलोग्राम वर्ग में 240 किलोग्राम उठाकर कांस्य पदक) जीतकर...सबकी लाज बचा ली....कर्णम ओलिम्पिक खेलों में निजी पदक जीतनेवाली पहली और अकेली महिला खिलाडी बन गयीं. ... संघ के सचिव भाटिया पर लगा दाग भी कांसे की चमक में छुप गया.
चार साल बाद एथेंस में इस टीम से और उम्मीद बढ़ी. लगा वेटलिफ्टर एथेंस में कुछ और नए मुकाम ज़रूर छुएंगे.......मगर इस टीम की दो खिलाड़ी (प्रतिमा कुमारी और सानामाचा चान्हु) डोपिंग में धरी गयीं....और इसकी वज़ह से सभी भारतीय को शर्मसार होना पड़ा....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर प्रतिबन्ध तक लगा दिया गया.
उससे भी बड़े शर्म की बात ये रही की ये सिलसिला आगे भी बरकरार रहा...2006 कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान एकबार फिर भारतीय खिलाड़ी डोपिंग के दोषी पाए गए....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर अंतर्राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग संघ ने फिर प्रतिबन्ध लगाया...ऐसे में खिलाड़ियों को तो सज़ा मिली...मगर एक बार भी किसी अधिकारी पर आंच नही आयी....ख़बर है की इस बार बलबीर भाटिया भ्रष्टाचार के आरोप में घिर सकते हैं.... लेकिन उससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया है....
भारतीय वेटलिफ्टर अधिकारियों पर कई तरह के आरोप लगाते हैं.....लेकिन भारत में खेल संघ इतने ताकतवर हैं की वो अपनी शिकायत सुना नही सकते. वैसे भी क्रिकेट के इस देश में वेत्लिफ्टिंग जैसे खेल अब ज्यादातर नौकरी हासिल करने का जरिया भर रह गए हैं....धीरे-धीरे इस खेल से से मुंह मोड़नेवाले लोगों की तादाद ही नज़र आती है.... ऐसे में ये खेल कब यहाँ दम तोड़ दे आपको ख़बर भी नही होगी...
2006 दोहा एशियाड में भारतीय हॉकी टीम पहली बार पोडियम पर पहुँचने में नाकाम रही तो पाकिस्तान को कांसे से संतोष करना पडा. फ़र्ज़ कीजिये 2012 के लंदन ओलिम्पिक खेलों में भारत के साथ पाकिस्तान हॉकी टीम ओलिम्पिक में क्वालिफाई करने से चूक जाती है .....ऐसे में इस खेल का ओलिम्पिक में टिकना मुश्किल हो जायेगा....इसे ओलिम्पिक से बाहर करने को लेकर पहले भी बहस हो चुकी है....
जर्मनी (मूनशेनग्लाडबाख) में 2006 में हुए हॉकी वर्ल्ड कप के फाइनल को देखने सिर्फ़ 4000 के करीब देखने लोग इकठा हुए...मतलब साफ है इस खेल की जड़ भारत और पाकिस्तान में ही है....अगर यहाँ हालात बिगड़े गए तो एशियाड और ओलिम्पिक के साथ इस खेल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा....हॉकी और वेटलिफ्टिंग से जुड़े खिलाड़ी, फैंस और अधिकारियों के लिए खतरे की घंटी बज रही है....
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