Wednesday, April 30, 2008

थप्पड़ की गूंज

आज से दस-पन्द्रह साल पहले और उससे भी पहले जब हम मोहल्ले में क्रिकेट खेलते थे, तो समय की कमी की वज़ह से और इसलिए भी कि मैच का नतीजा निकल आए आधे दिन का मैच खेलते थे। मैच उन दिनों भी 20-20 ओवर का ही होता था। ख़ास बात यह थी कि इन मैचों में हारने वाली टीम के कप्तान को जीतने वाली टीम के स्कोर-रजिस्टर में हस्ताक्षर करना पड़ता था, लेकिन हारने वाली टीम का कप्तान अगर कद-काठी में बलवान दिखता था तो कई बार अपने रौब के ज़रिये इस प्रक्रिया से बच जाता था।

आईपीएल में पंजाब के किंग्स इलेवन और मुम्बई इंडियन की टीमों को एक भी जीत नहीं मिली थी, इसलिए दोनों ही टीमें हर हाल में जीत हासिल करने के इरादे से मैदान पर उतरीं। मैच के दौरान श्रीसंत अपने ही स्टाइल में खिलाड़ियों को छेड़ते रहे (रॉबिन उथप्पा, शॉन पोलाक और मुसाविर खोते को), लेकिन उन्हें ये मालूम नहीं था कि मैच के बाद ये उन्हें इतना महंगा पड़ेगा। फिर भी, मैच ख़त्म होने पर मुम्बई इंडियन टीम के कप्तान हरभजन सिंह ने जो कुछ किया वह बिल्कुल ख़राब मोहल्ले क्रिकेट जैसा ही वाकया लगा।

भारतीय क्रिकेट में अनिल कुंबले के बाद सबसे ज़्यादा विकेट (275 टेस्ट विकेट) झटकने वाले स्पिन गेंदबाज़ भज्जी पहले भी विवादों में पड़ते रहे हैं। इस बार भले ही श्रीसंत ने उन्हें माफ़ कर दिया हो लेकिन ये वाकया उन्हें काफी महंगा पड़ने वाला है। साल के शुरुआत में (जनवरी 2007) में सिडनी टेस्ट के दौरान एंड्र्यू साइमंड्स से उनके झगड़े के बाद टीम इंडिया, बीसीसीआई और पूरा देश उनके साथ था लेकिन इस बार वह बिल्कुल अकेले हैं और उनके पीछे उनकी काबिलियत से ज़्यादा उनका विवादास्पद इतिहास है। उनके पंजाब के साथी युवराज (विपक्षी टीम के कप्तान) भी उनसे नाराज़ हैं। हरभजन ने सफाई दी की ये उनके और श्रीसंत के बीच का मामला है जिसे कोई मनाने को तैयार नही, बीसीसीआई भी नही। बड़ी बात ये है की इन सबका असर कहीं उनके फैंस की तादाद पर ना पड़े, और शायद स्पॉन्सर पर भी।

लेकिन, सिर्फ़ इस मुद्दे को लेकर उन्हें मोगेम्बो बना देना भी जायज़ नही लगता। दरअसल ट्वेंटी-20 क्रिकेट की फितरत ही ऐसी है कि इसे नतीजे के लिए खेला जाता है। इसमें पैसे की वज़ह से खिलाड़ियों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव होता है। नतीजा (जीत) हर कीमत पर चाहिए। स्पॉन्सर, खिलाड़ी और उनके फैंस सब इसी चाह से टीम से जुड़े हैं। फिर इस खेल से जेंटिलमेन गेम की धारणा (औपनिवेशिक धारणा) अब लुप्त होती दिख रही है। क्रिकेट तीन घंटे का सिनेमा बना दिया गया है तो इसका सबसे ज़्यादा दबाव खिलाड़ियों पर बढ़ा है। अब यहां फुटबॉल मैदान जैसा जूनून दिखाई पड़ता है तो कई बार वैसी ही झड़प भी देखने को मिल जाती है। फिर ऐसा भी नहीं कि भज्जी की हरकत खेल की दुनिया की अकेली और अनूठी हरकत है।

करीब दो साल पहले 2006 वर्ल्ड कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदाने के किए गए हेड बूट (इटली के मार्को मतेरात्जी के ख़िलाफ़) को कौन भूल पाया है। उसी तरह करीब पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। खूब बखेड़ा हुआ। दुनिया भर के अखबारों में ये खबरें छाई रहीं।

खेल की दुनिया में ऐसे किस्से, विवादों के न जाने कितने उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे। क्रिकेट में भी ड्रेसिंग रूम में ऐसे कई विवाद होते हैं जो सबके सामने नही आते। क्रिकेट स्टार शोएब अख्तर की मानें तो पाकिस्तान ड्रेसिंग रूम में छुरियां तक निकल चुकी हैं। हां, इन सबको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है जो जायज़ भी है। भज्जी भी इससे बचकर नही निकल सकते। भारतीय ड्रेसिंग रूम में भी ऐसी कई घटनाएं होती रही हैं जो कभी आप तक नही पहुंच पाईं। फिर श्रीसंत को तो पूरी दुनिया ने टेलिविज़न और तस्वीरों में फफक-फफक कर रोते देखा है।

भज्जी और दूसरे क्रिकेट खिलाड़ियों को अब यह याद रखना होगा की भारतीय फैन और मीडिया क्रिकेट के साथ अब खेल से ज्यादा धर्म और जुनून की तरह व्यवहार करते हैं। इसलिए ये फैंस अब उनके क्रिकेट करियर में उन्हें इस घटना के बगैर याद नही करेंगे। खासकर तब तो बिल्कुल भी नही जब उनका प्रदर्शन मैच में ख़राब होगा।

बीसीसीआई ने भज्जी को आईपीएल से निलंबित कर साफ कर दिया है की उन्हें आसानी से मुक्ति नही मिलने वाली। अस्सी के दशक के आख़िर में सुभाष घई की एक फिल्म के खलनायक डॉ. डेंग को हीरो दिलीप कुमार एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाते हैं, तो डॉ. डेंग कहता है "इस थप्पड़ की गूंज सूनी तुमने राणा। अब तुम्हें इस गूंज की गूंज सुनाई देगी।" न्यूज़ चैनल्स और अखबारों ने ये तय कर दिया है की भज्जी जब तक क्रिकेट खेलेंगे उन्हें इस थप्पड़ की गूंज सुनाई देगी और अब उन्हें आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ) की भी पैनी निगाहों के पहरे में खेलना होगा।

पैसा हज़म, हॉकी खत्म

पर्थ में हो रहे फ़ोर नेशन्स हॉकी टूर्नामेंट में दक्षिण कोरिया ने भारत को 4-1 से हरा दिया। इस खबर को जानने की बेताबी हुई कि जिस टीम को आठ महीने पहले भारत ने चेन्नई एशिया कप के दौरान दो बार हराकर एशिया कप का ख़िताब जीता था, उसके हाथों बुरी तरह कैसे हारा, लेकिन अखबारों में यह खबर भी ढूंढनी पड़ी कि भारतीय टीम दक्षिण कोरिया से हार गई है। आठ पंक्तियों की भी मैच रिपोर्ट किसी अखबार में छपी नहीं दिखी। ऐसे में बाज़ार और टीआरपी से पीड़ित टीवी चैनलों में इस खबर को ढूंढना बेमानी ही लगा। हां, हॉकी को लेकर मैदान के बाहर के विवाद की खबरें झमाझम दिखीं।

शायद यही हॉकी का दर्द है...

जिस दिन हॉकी संघ के सचिव के. ज्योतिकुमारन रिश्वत लेते कैमरे पर पकड़े गए, इस संवाददाता ने धनराज पिल्लै से फो़न पर बात की। धनराज ने कहा, मैं खबर सुनकर इतना चौंक गया कि मेरे होश उड़ गए। मैं (मुंबई में) अपनी गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर सोच में पड़ गया और 15 मिनट बाद ही वहां से चल पाया। धनराज ने कहा कि उनके पास पत्रकारों और हॉकी खिलाड़ियों के फ़ोन आ रहे हैं कि अगर अब नहीं कहा तो लोग यह भी कहेंगे कि कहीं धनराज या ज़्यादातर खिलाड़ी पैसे लेकर ही तो ओलंपिक नहीं खेलते। कुछ ऐसी ही बात 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा ओलम्पिक्स में भारतीय टीम के कप्तान परगट सिंह ने भी की। उन्होंने कहा मेरे तो पांव कांप रहे हैं। उन्होंने कहा कि ज्योतिकुमारन को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

हॉकी प्रेमी और जानकार इस खबर के बाद दुखी भी हैं और हैरान भी, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये बातें हॉकी की बात करने वाले इससे जुड़े लोग जानते नहीं थे। 1975 वर्ल्ड कप में फ़ाइनल गोल करने वाले अशोक कुमार (हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के पुत्र) मानते हैं कि ये चीज़ें हॉकी में कई साल से चल रही है। वो ऐसी कई खबरें विश्वस्त सूत्रों से सुनते रहे हैं। यह और बात है कि सबूत अब सामने आया है। अशोक कुमार और ज़फ़र इक़बाल जैसे कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक कहा कि चलो अच्छा हुआ, इसी बहाने हॉकी से गंदगी साफ़ तो होगी।

हॉकी टीम में चयन को लेकर सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं, लेकिन कई पूर्व ओलंपियन मानते हैं कि पहले की धांधली में खिलाड़ियों में 19-20 का फ़र्क होता था, लेकिन पिछले 15 साल में (गिल और ज्योतिकुमारन के कार्यकाल में) ये सारी सीमाएं टूट गईं। 2004 एथेंस ओलम्पिक्स से पहले भारतीय हॉकी टीम एरिज़ोना (अमेरिका) अभ्यास के लिए गई। वहां टीम में एडम सिंक्लेयर नाम के खिलाड़ी को लिया गया तो टीम के दूसरे खिलाड़ियों की भौंहें तन गईं। पूर्व कप्तान गगन अजित सिंह ने कहा, मैंने तो इस खिलाड़ी का नाम भी नहीं सुना था। अगर जूनियर टीम से किसी को शामिल किया जाता है तो आमतौर पर पता होता है कि वह कैसा खेलता है, लेकिन इस खिलाड़ी के बारे में तो टीम में कोई कुछ नहीं जानता। बाद में पता चला, यूनिवर्सिटी स्तर का यह खिलाड़ी हॉकी से कम, एथलेटिक्स (ट्रिपल जंप, लॉन्ग जंप) से ज़्यादा वास्ता रखता है।
यह पहला मौका है, जब 80 साल के ओलम्पिक इतिहास में भारतीय हॉकी टीम बीजिंग खेलों में मौजूद नहीं होगी, लेकिन उससे भी बड़ी हैरानी यह देखकर हो रही है कि ज़्यादातर लोग इस खेल को भारत में हमेशा के लिए खत्म मान रहे हैं। इसमें खासकर उन लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है, जो क्रिकेट और उसके आईपीएल जैसे साइड इफेक्ट्स से ओतप्रोत हैं।

नए खेल मंत्री डॉ. एमएस गिल ने एक दिन पहले ही (23 अप्रैल को) ऐलान किया कि भारतीय हॉकी टीम चाहे 10 बार बुरी तरह हारे, फिर भी वह हॉकी को ही राष्ट्रीय खेल मानेंगे, क्योंकि इस खेल से लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं। उनके मुताबिक हॉकी और फ़ुटबॉल जैसे खेल ही आम लोगों का खेल साबित हो सकते हैं। कम से कम इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि उनकी कथनी और करनी में फ़िलहाल ज़्यादा फ़र्क नहीं दिखता। उन्होंने हॉकी सहित सात दूसरे खेलों को सरकार की प्राथमिकता सूची में लाने का ऐलान कर दिया। आते ही उन्होंने अपने सहपाठी केपीएस गिल से भी हॉकी संघ के अध्य्क्ष का पद छोड़कर किसी और को हॉकी का जिम्मा लेने की गुज़ारिश कर डाली।

लेकिन यह भी सही है कि हॉकी के पूरे तंत्र में इतना घुन लग चुका है कि कब पूरी इमारत ढहती दिखे, कोई कह नहीं सकता। हॉकी फिर से आज़ादी के पहले या आज़ादी के बाद '60 के दशक की चमक पा सके, इसके लिए किसी नए खेल को दुनिया के मानचित्र में अव्वल बनाने जैसी कोशिश करनी होगी। इन सबके बीच सकारात्मक बात सिर्फ यह है कि भारत में इस खेल से अब भी करोड़ों लोग जुड़ाव महसूस करते हैं और इस खेल में अब भी यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं।

वन-डे को खा जाएगा आईपीएल...

आज से क्रिकेट में एक नई जंग शुरू होगी और वह कई नई दिशाओं में दौड़ेगा... खिलाड़ियों और टीमों के सपनों को नया आयाम मिलेगा... 44 दिन के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के लिए देश के आठ बिज़नेस किंग ने 3000 करोड़ रुपये से ज़्यादा रकम लगाकर दांव खेला है... ज़ाहिर है, इसकी कामयाबी के लिए ये धुरंधर कोई कसर नहीं छोड़ंगे...

क्रिकेट और ग्लैमर का ये मिलाजुला रूप और उसका प्रभाव दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा... इसकी बड़ी वजह यह भी है कि क्रिकेट को दीवानगी की हद तक चाहनेवाले इस देश में क्रिकेट के बाज़ार की ताकत का सही अंदाज़ा नहीं लगाया जा सका... यह ज़रूर है कि कई जानकार आईपीएल की उपज को इंडियन क्रिकेट लीग (कपिल और एस्सेल ग्रुप) के जवाब के तौर पर देखते हैं... लेकिन उससे बड़ी बात यह है कि बीसीसीआई की आईपीएल ने दुनिया भर के सितारों को इकट्ठा कर इसकी रौनक बढ़ा दी है... यहां तक कि खिलाड़ी अपनी पुरानी काउंटी और देश की टीमों के प्रति ज़िम्मेदारियों से ऊपर उठकर सोच रहे हैं... यह बात दीगर है कि उसके लिए तर्क भी ढूंढ लिए गए हैं...

राजस्थान रॉयल स्क्वाड के शेन वॉर्न के मुताबिक आईपीएल में खेलना खिलाड़ियों को काउंटी से ज़्यादा तरजीह देने की बात नहीं है... उन्हें लगता है कि इससे दुनिया भर में क्रिकेट को बढ़ावा मिलेगा... उनका इशारा न सिर्फ क्रिकेट की लोकप्रियता पर है, बल्कि वह उन हरे नोटों की भी बात कर रहे हैं, जिसे खिलाड़ी कई बार घरेलू स्तर पर पाने से महरूम रह जाते थे...

आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स और बेंगलुरु के रॉयल चैलेंज की टीमें टक्कर लेंगी तो उनकी पहचान खिलाड़ियों से ज़्यादा इनके मालिकों की टक्कर के रूप में होगी... लोगों में होड़ है भी तो इस बात को लेकर कि शाहरुख की टीम जीतेगी या विजय माल्या की... प्रीति ज़िंटा की या मुकेश अंबानी की... दादा और द्रविड़ के नाम पीछे आ रहे हैं...

खालिस क्रिकेट को चाहने वालों में इसे लेकर आपत्ति भी है और डर भी कि कहीं ग्लैमर की चकाचौंध में खेल की मूल भावना दब न जाए... क्रिकेट के प्यूरिस्ट जानकारों को लगता है कि इसका असर टेस्ट या वन-डे पर पड़ना लाजिमी है... 70 टेस्ट और 63 वन-डे खेल चुके पूर्व ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज़ डेनिस लिली (355 टेस्ट विकेट, 103 वन-डे विकेट) मानते हैं कि इसका असर वन-डे क्रिकेट के अस्तित्व पर भी पड़ सकता है... उन्हें लगता है कि इस 20-20 लीग से वन-डे के मुकाबले टेस्ट क्रिकेट को ज़्यादा खतरा है...

दरअसल लिली का डर मीडिया मुगल कैरी पैकर के क्रिकेट आन्दोलन की याद ताजा करता है, जब 70 के दशक में पैकर ने वन-डे क्रिकेट को नई दिशा देने की कोशिश की... उस वक्त भी खालिस क्रिकेट से प्रेम करने वाले लोगों ने वन-डे क्रिकेट को पाजामा क्रिकेट कहकर मज़ाक उड़ाया था... लेकिन वक्त की कमी और ग्लैमर से भरपूर वन-डे ने टेस्ट की चाहत को पीछे ढकेला है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता... भारत जैसे क्रिकेट के दीवाने देश में भी स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी के बावजूद स्टेडियम पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या इतनी कम होती है कि संदेह होने लगता है कि इस देश में क्रिकेट को लोग धर्म की तरह पूजते हैं...

20-20 क्रिकेट भी आज के दौर की हकीकत है... वैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 20-20 क्रिकेट बहुत पुराना नहीं है... लीग और घरेलू स्तर पर अलग-अलग देशों में चाहे यह पहले भी खेला जाता रहा हो, लेकिन पहला अंतरराष्ट्रीय 20-20 मैच ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के बीच फरवरी 2005 में खेला गया... और उसके बाद से साढ़े तीन घंटे का यह मैच जिस रफ्तार से खेला जाता है, उससे भी ज़्यादा तेज़ रफ्तार से बाज़ार में दौड़ रहा है... यह भी उम्मीद की जा रही है कि इन 44 दिनों में कई सितारे बेहद जल्दी दुनिया के मानचित्र पर अपना सिक्का जमाते नज़र आएंगे, तो कई खिलाड़ी इस जुझारू क्रिकेट में अपनी फिटनेस और क्रिकेट पर दांव लगाते नज़र आएंगे...

यही वजह है कि 20-20 अलग-अलग रूपों में लुभावने बाज़ार पैदा कर रहा है... ऐसे में क्रिकेट, मैदानों से बाहर कितने रूप अख्तियार करेगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है...