पर्थ में हो रहे फ़ोर नेशन्स हॉकी टूर्नामेंट में दक्षिण कोरिया ने भारत को 4-1 से हरा दिया। इस खबर को जानने की बेताबी हुई कि जिस टीम को आठ महीने पहले भारत ने चेन्नई एशिया कप के दौरान दो बार हराकर एशिया कप का ख़िताब जीता था, उसके हाथों बुरी तरह कैसे हारा, लेकिन अखबारों में यह खबर भी ढूंढनी पड़ी कि भारतीय टीम दक्षिण कोरिया से हार गई है। आठ पंक्तियों की भी मैच रिपोर्ट किसी अखबार में छपी नहीं दिखी। ऐसे में बाज़ार और टीआरपी से पीड़ित टीवी चैनलों में इस खबर को ढूंढना बेमानी ही लगा। हां, हॉकी को लेकर मैदान के बाहर के विवाद की खबरें झमाझम दिखीं।
शायद यही हॉकी का दर्द है...
जिस दिन हॉकी संघ के सचिव के. ज्योतिकुमारन रिश्वत लेते कैमरे पर पकड़े गए, इस संवाददाता ने धनराज पिल्लै से फो़न पर बात की। धनराज ने कहा, मैं खबर सुनकर इतना चौंक गया कि मेरे होश उड़ गए। मैं (मुंबई में) अपनी गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर सोच में पड़ गया और 15 मिनट बाद ही वहां से चल पाया। धनराज ने कहा कि उनके पास पत्रकारों और हॉकी खिलाड़ियों के फ़ोन आ रहे हैं कि अगर अब नहीं कहा तो लोग यह भी कहेंगे कि कहीं धनराज या ज़्यादातर खिलाड़ी पैसे लेकर ही तो ओलंपिक नहीं खेलते। कुछ ऐसी ही बात 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा ओलम्पिक्स में भारतीय टीम के कप्तान परगट सिंह ने भी की। उन्होंने कहा मेरे तो पांव कांप रहे हैं। उन्होंने कहा कि ज्योतिकुमारन को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।
हॉकी प्रेमी और जानकार इस खबर के बाद दुखी भी हैं और हैरान भी, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये बातें हॉकी की बात करने वाले इससे जुड़े लोग जानते नहीं थे। 1975 वर्ल्ड कप में फ़ाइनल गोल करने वाले अशोक कुमार (हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के पुत्र) मानते हैं कि ये चीज़ें हॉकी में कई साल से चल रही है। वो ऐसी कई खबरें विश्वस्त सूत्रों से सुनते रहे हैं। यह और बात है कि सबूत अब सामने आया है। अशोक कुमार और ज़फ़र इक़बाल जैसे कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक कहा कि चलो अच्छा हुआ, इसी बहाने हॉकी से गंदगी साफ़ तो होगी।
हॉकी टीम में चयन को लेकर सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं, लेकिन कई पूर्व ओलंपियन मानते हैं कि पहले की धांधली में खिलाड़ियों में 19-20 का फ़र्क होता था, लेकिन पिछले 15 साल में (गिल और ज्योतिकुमारन के कार्यकाल में) ये सारी सीमाएं टूट गईं। 2004 एथेंस ओलम्पिक्स से पहले भारतीय हॉकी टीम एरिज़ोना (अमेरिका) अभ्यास के लिए गई। वहां टीम में एडम सिंक्लेयर नाम के खिलाड़ी को लिया गया तो टीम के दूसरे खिलाड़ियों की भौंहें तन गईं। पूर्व कप्तान गगन अजित सिंह ने कहा, मैंने तो इस खिलाड़ी का नाम भी नहीं सुना था। अगर जूनियर टीम से किसी को शामिल किया जाता है तो आमतौर पर पता होता है कि वह कैसा खेलता है, लेकिन इस खिलाड़ी के बारे में तो टीम में कोई कुछ नहीं जानता। बाद में पता चला, यूनिवर्सिटी स्तर का यह खिलाड़ी हॉकी से कम, एथलेटिक्स (ट्रिपल जंप, लॉन्ग जंप) से ज़्यादा वास्ता रखता है।
यह पहला मौका है, जब 80 साल के ओलम्पिक इतिहास में भारतीय हॉकी टीम बीजिंग खेलों में मौजूद नहीं होगी, लेकिन उससे भी बड़ी हैरानी यह देखकर हो रही है कि ज़्यादातर लोग इस खेल को भारत में हमेशा के लिए खत्म मान रहे हैं। इसमें खासकर उन लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है, जो क्रिकेट और उसके आईपीएल जैसे साइड इफेक्ट्स से ओतप्रोत हैं।
नए खेल मंत्री डॉ. एमएस गिल ने एक दिन पहले ही (23 अप्रैल को) ऐलान किया कि भारतीय हॉकी टीम चाहे 10 बार बुरी तरह हारे, फिर भी वह हॉकी को ही राष्ट्रीय खेल मानेंगे, क्योंकि इस खेल से लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं। उनके मुताबिक हॉकी और फ़ुटबॉल जैसे खेल ही आम लोगों का खेल साबित हो सकते हैं। कम से कम इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि उनकी कथनी और करनी में फ़िलहाल ज़्यादा फ़र्क नहीं दिखता। उन्होंने हॉकी सहित सात दूसरे खेलों को सरकार की प्राथमिकता सूची में लाने का ऐलान कर दिया। आते ही उन्होंने अपने सहपाठी केपीएस गिल से भी हॉकी संघ के अध्य्क्ष का पद छोड़कर किसी और को हॉकी का जिम्मा लेने की गुज़ारिश कर डाली।
लेकिन यह भी सही है कि हॉकी के पूरे तंत्र में इतना घुन लग चुका है कि कब पूरी इमारत ढहती दिखे, कोई कह नहीं सकता। हॉकी फिर से आज़ादी के पहले या आज़ादी के बाद '60 के दशक की चमक पा सके, इसके लिए किसी नए खेल को दुनिया के मानचित्र में अव्वल बनाने जैसी कोशिश करनी होगी। इन सबके बीच सकारात्मक बात सिर्फ यह है कि भारत में इस खेल से अब भी करोड़ों लोग जुड़ाव महसूस करते हैं और इस खेल में अब भी यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment