गगन नारंग ने ८ मई, २००८ (आज) चेक गणराज्य के पिल्जें में एक वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया. क्योंकि ये प्रतियोगिता अंतर्राष्ट्रीय शूटिंग संघ के कैलेंडर में शामिल नही, इसलिए इस रिकॉर्ड को मान्यता नही मिलेगी. लेकिन
चेक गणराज्य में आयोजित शूटिंग की ग्रां प्री में ५० मीटर प्रोन प्रतियोगिता में वर्ल्ड रेकॉर्ड स्कोर (६००/६००) किया तो हैरानी सिर्फ़ इसलिए हुई कि ये उनका ख़ास ईवेंट नही है.
गगन दुनिया के वर्ल्ड नंबर एक खिलाड़ी रह चुके हैं. पिछली दफा एथेंस ओलिम्पिक्स में वो १० मीटर एयर राइफल के फाइनल में सिर्फ़ एक अंक से पहुँचने से रह गए थे. इस बार अंतर्राष्ट्रीय शूटिंग संघ ने अपने वेबसाइट में उन्हें भारत की ओर से मेडल जीतने वाले प्रबल दावेदारों की फेहरिस्त में शामिल किया है...गगन को दरअसल १० मीटर एयर राइफल प्रतियोगिता के महारथी हैं...
गगन ने ई-मेल के ज़रिये कहा कि वो बहुत खुश हैं...लेकिन इतने प्रतिभाशाली खिलाड़ी के पीछे आज से ठीक तीन महीने पीछे जब दुनिया दीवानी नज़र आयेगी तब हिन्दुस्तानी खेल प्रेमियों को वाकई बड़ी खुशी होगी.
मैं वो दिन देख रहा हूँ जब स्पांसर गगन की हर चाल, अदा को भुनाते नजाए आयेंगे. टेलीविज़न के पत्रकार इस खिलाड़ी के हर इंटरव्यू से अपना नंबर बढाते नज़र आयेंगे. प्रिंट के पत्रकार भी शायद इसे लेकर तरह-तरह के दावे पेश करें. लेकिन आज हकीकत ये है कि कोई भी न्यूज़ चैनल इस ख़बर को अपना १० सेकेंड देनें में भी अपनी तौहीन समझ रहा है. शायद सभी न्यूज़ चैनल जानते हैं कि ये ख़बर कोई नही देखना चाहता और ये फैसला कर चुके हैं ये बतकही है ख़बर नही. क्या ये वाकई ख़बर नही है? क्या आप ये नही जानना चाहते की तीन महीने बाद ओलिम्पिक में कौन भारतीय खिलाड़ी पदक पर अपना नाम लिख सकता है?
Thursday, May 8, 2008
क्या हो गयी है खेल पत्रकारिता
आज मैं कुछ खेल के पत्रकारों की बातें सुन रहा था. वो भारत मैं आए खली द ग्रेट की बातें कर रहे थे. मैं दंग था. जिस तरह वो खाली के गुर-दाँव पर विशेषज्ञों की तरह बात कर रहे थे मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी ...इस दौरान इन विशेषज्ञों की वजह से मैंने डब्लूडब्लूई के हेड -बट, खली वाइज़- ग्रिप, खली बॉम्ब, बिग बूट, स्पिन किक जैसे कई दावों के नाम सुने. और मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी कि इस विषय पर ये कितनी देर बात कर सकते हैं.
इत्ताफाकन 100 मीटर स्प्रिंट की बात भी चल पडी..और तब जो मैंने सुना या नही सुन पाया उसने मुझे ज्यादा हैरान किया. ताज्जुब हुआ कि किसी को ये नही पता था की हाल में 3-4 दिन पहले किसने 100 मीटर की रेस मैं एक इतिहास कायम किया है. मैंने थोड़ा हिंट देने की कोशिश की कि ये खिलाड़ी असाफा पॉवेल के देश (जमैका) का रहनेवाला है. खबरों की दुनिया और उसमें भी भी खेल की दुनिया से जुड़े पत्रकारों का ये हाल था कि उन्होंने उसैन बोल्ट के अलावा सबका नाम ले लिया.
ज़ाहिर है उसने ये रेस 9.76 सेकेंड में ये दौड़ पूरी की होगी इसकी उम्मीद करना छलावा ही होता. लेकिन 10 सेकंड के अन्दर ही ये पत्रकार 100 मीटर दौड़ के भी विशेषज्ञ बन गए. इसे लाजवाब आत्मविश्वास कहें या अपने आप के प्रति बेमिसाल उद्दंडता या फिर कुछ और ये आप तय करें....
इत्ताफाकन 100 मीटर स्प्रिंट की बात भी चल पडी..और तब जो मैंने सुना या नही सुन पाया उसने मुझे ज्यादा हैरान किया. ताज्जुब हुआ कि किसी को ये नही पता था की हाल में 3-4 दिन पहले किसने 100 मीटर की रेस मैं एक इतिहास कायम किया है. मैंने थोड़ा हिंट देने की कोशिश की कि ये खिलाड़ी असाफा पॉवेल के देश (जमैका) का रहनेवाला है. खबरों की दुनिया और उसमें भी भी खेल की दुनिया से जुड़े पत्रकारों का ये हाल था कि उन्होंने उसैन बोल्ट के अलावा सबका नाम ले लिया.
ज़ाहिर है उसने ये रेस 9.76 सेकेंड में ये दौड़ पूरी की होगी इसकी उम्मीद करना छलावा ही होता. लेकिन 10 सेकंड के अन्दर ही ये पत्रकार 100 मीटर दौड़ के भी विशेषज्ञ बन गए. इसे लाजवाब आत्मविश्वास कहें या अपने आप के प्रति बेमिसाल उद्दंडता या फिर कुछ और ये आप तय करें....
'तेरी माँ को बख्शा' तो....
माँ को बख्शा' तो....
बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट संघ) कमाल है. उसने इसी साल सिडनी टेस्ट (2-6 जनवरी, भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया ) के दौरान और उसके बाद उस खिलाड़ी का बचाव किया, जिसने माना कि मैदान पर उसने दूसरे खिलाड़ी (एंड्र्यू साइमंड्स) को गाली दी..चलिए मसला दूसरे देश के खिलाड़ी और रेसिज्म से जुडा था, इसलिए बचाव कर भी लिया...पर क्या उस वक्त भारत में उस खिलाड़ी को सज़ा नही दी जानी चाहिए थी ? कम से कम ये कहकर कि भारत में इस गाली को ख़राब माना जाता है.... और किसी भी रोल मॉडल या मानी जानी वाली हस्ती को ये सब कहने-करने से पहले दस बार सोचना पडेगा...
अब भज्जी ने जो किया बीसीसीआई के अधिकारी उसे पचा नही पा रहे..नैतिकता के प्रणेता बने फिर रहे हैं..भज्जी के खुलेआम माफीनामे के बाद भी कह रहे हैं कि इस खिलाड़ी का ट्रैक रेकॉर्ड ख़राब है. लेकिन ये समझना चाहिए कि जो खिलाड़ी माँ की गाली के बाद किसी हीरो की तरह सराहा जाएगा वो आगे वैसा कर सकता है जैसा उसने किया.
आपने एक चोर की कहानी सुनी होगी जिसकी माँ उसे बचपन में चोरियाँ करना सिखाती थी. बाद में वो बड़ा मशहूर चोर बन गया. बहुत वर्षों बाद जब जवानी में वो चोर पकड़ा गया तो उस राज्य के राजा ने उसे फांसी की सज़ा दे दी. फांसी के पहले चोर से उसकी आख़िरी इच्छा पूछी गयी. उसने कहा वो मरने से पहले अपनी माँ के कानों में कुछ कहना चाहता है. उसे इसकी इजाज़त मिली. वो अपनी माँ के कानों में कुछ कहने गया और ये कहकर कान काट लिया की ये सब उसी ने उसे सिखाया है. इसलिए उसे भी सज़ा मिलनी चाहिए. बीसीसीआई चोर की माँ की भूमिका निभा रहा है.
वैसे भी मैदान पर मारपीट की ये पहली घटना नही है. साल पहले 2006 फुटबॉल कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदान ने इटली के मार्को मतेरात्जी को मैदान पर हेड-बट से गिराया तो उसकी आलोचना हुई. जिदान और उसकी टीम को उसका भारी खामियाजा भी भुगतना पडा. लेकिन उन्हें फांसी पर नही चढा दिया गया. पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। मगर दोनों का करियर खत्म नही कर दिया गया.
चीन में कर(टैक्स ) चोरी से लेकर, भ्रष्टाचार और मर्डर- सबकी सज़ा फांसी है..हरभजन पर पहले ही बड़ा जुर्माना लगाया जा चुका है..अब दो या तीन सीरीज़ के बैन से लेकर आजीवन प्रतिबन्ध की बात चल रही है.. ऐसा कर बीसीसीआई क्या साबित करना चाहता है? ऐसा करने से पहले उसे अपने दामन में ज़रूर झांकना चाहिए. तब जो उदाहरण वो पेश करेंगे उसका सचमुच कोई मतलब होगा.
बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट संघ) कमाल है. उसने इसी साल सिडनी टेस्ट (2-6 जनवरी, भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया ) के दौरान और उसके बाद उस खिलाड़ी का बचाव किया, जिसने माना कि मैदान पर उसने दूसरे खिलाड़ी (एंड्र्यू साइमंड्स) को गाली दी..चलिए मसला दूसरे देश के खिलाड़ी और रेसिज्म से जुडा था, इसलिए बचाव कर भी लिया...पर क्या उस वक्त भारत में उस खिलाड़ी को सज़ा नही दी जानी चाहिए थी ? कम से कम ये कहकर कि भारत में इस गाली को ख़राब माना जाता है.... और किसी भी रोल मॉडल या मानी जानी वाली हस्ती को ये सब कहने-करने से पहले दस बार सोचना पडेगा...
अब भज्जी ने जो किया बीसीसीआई के अधिकारी उसे पचा नही पा रहे..नैतिकता के प्रणेता बने फिर रहे हैं..भज्जी के खुलेआम माफीनामे के बाद भी कह रहे हैं कि इस खिलाड़ी का ट्रैक रेकॉर्ड ख़राब है. लेकिन ये समझना चाहिए कि जो खिलाड़ी माँ की गाली के बाद किसी हीरो की तरह सराहा जाएगा वो आगे वैसा कर सकता है जैसा उसने किया.
आपने एक चोर की कहानी सुनी होगी जिसकी माँ उसे बचपन में चोरियाँ करना सिखाती थी. बाद में वो बड़ा मशहूर चोर बन गया. बहुत वर्षों बाद जब जवानी में वो चोर पकड़ा गया तो उस राज्य के राजा ने उसे फांसी की सज़ा दे दी. फांसी के पहले चोर से उसकी आख़िरी इच्छा पूछी गयी. उसने कहा वो मरने से पहले अपनी माँ के कानों में कुछ कहना चाहता है. उसे इसकी इजाज़त मिली. वो अपनी माँ के कानों में कुछ कहने गया और ये कहकर कान काट लिया की ये सब उसी ने उसे सिखाया है. इसलिए उसे भी सज़ा मिलनी चाहिए. बीसीसीआई चोर की माँ की भूमिका निभा रहा है.
वैसे भी मैदान पर मारपीट की ये पहली घटना नही है. साल पहले 2006 फुटबॉल कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदान ने इटली के मार्को मतेरात्जी को मैदान पर हेड-बट से गिराया तो उसकी आलोचना हुई. जिदान और उसकी टीम को उसका भारी खामियाजा भी भुगतना पडा. लेकिन उन्हें फांसी पर नही चढा दिया गया. पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। मगर दोनों का करियर खत्म नही कर दिया गया.
चीन में कर(टैक्स ) चोरी से लेकर, भ्रष्टाचार और मर्डर- सबकी सज़ा फांसी है..हरभजन पर पहले ही बड़ा जुर्माना लगाया जा चुका है..अब दो या तीन सीरीज़ के बैन से लेकर आजीवन प्रतिबन्ध की बात चल रही है.. ऐसा कर बीसीसीआई क्या साबित करना चाहता है? ऐसा करने से पहले उसे अपने दामन में ज़रूर झांकना चाहिए. तब जो उदाहरण वो पेश करेंगे उसका सचमुच कोई मतलब होगा.
Monday, May 5, 2008
सिकुड़ते मैदान ... जाति का बढ़ता दंस
दिल्ली के मुखर्जी नगर में जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार विद्यार्थियों के बीच हुई झड़प या हिंसा से मुझे हैरानी भी हो रही है और एक अजीब किस्म की कसमसाहट भी महसूस कर रहा हूँ.. ... हैरानी इसलिए भी है की जिस इलाके में ये घटना हुई है मैंने कभी वहाँ एक दशक से ज्यादा वक्त गुजारा है...
उन दिनों कम से कम जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार के बीच ऐसी कोई घटना सुनने में नही आयी...ऐसा नही है की उन दिनों वहाँ कोई राम राज्य था...लेकिन जाति को लेकर महानगर में हिंसा का ये रूप आम तो बिल्कुल नही था. क्या जाति का रक्तबीज नए अड्डे तलाश रहा है ?
इतना ज़रूर लगता है की समाज की बीमारी कैंसर टी तेजी से बढ़ती जा रही है. हर रोज़ मामूली बात को लेकर रोड पर होती हिंसा, कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ती अट्टालिकाएं और उससे उपजती तमाम मुश्किलें इन बीमारियों के लक्षण हैं......जब माँ-बाप बच्चों को फक्र से कहते थे कि 'पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब ' - उस वक्त जाति व्यवस्था अपने चरम पर होती थी. उन दिनों पल्वंकर बालू (1876 -1955) जैसे महान स्पिनर को भी टी- टाइम पर बाउंड्री के बाहर आकर चाय पीना पड़ता था (रामचंद्र गुहा- अ कोर्नेर ऑफ डी फोरेन फील्ड ).
कहा जाता है की किसी समाज को पहचानना है तो कभी वहाँ के मैदानों पर चले जाएं. मैदान पर लोगों की तादाद और उनके खेलने के तरीके से आप इलाके का मोटे तौर पर अंदाजा ज़रूर लगा सकते हैं...यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया में जाति को लेकर समाज वैसा नही बँटा जैसा अफगानिस्तान, पाकिस्तान या फिर भारत में है...
लगातार खत्म होते मैदान इसकी बहुत बड़ी वजह हैं..जिस तरह से बिल्डर, नेता और ब्युरोक्रैत के गुप्त गठबंधन
की वजह से अट्टालिकाएं मैदानों का अस्तित्व खत्म कर रही हैं...समाज की कुंठा और कुरूप होकर सबके सामने कभी रोड पर, कभी मुहल्ले में तो कभी गावों में फन काढ़ती नज़र आयेगी.
मतलब ये नही है की मैदानों के बना देने से जाति व्यवस्था खत्म हो जायेगी...मगर आने वाली पीढी स्वस्थ ज़रूर होगी.. वरना हर रोज़ घटती ये घटनाएँ जिस विध्वंस की चेतावनी दे रही हैं उसकी कल्पना से ही दिल दहल जाता है. महानगरों का हर शख्स कम से कम इस बात को लेकर ज़रूर चिंतित होता है कि कहीं वो रोड-रेज का शिकार नही हो जाए. मनोवैज्ञानिक रूप से ये बीमारी का ही लक्षण है... और इन सबको लेकर कम से कम सचेत होने के अलावा और कोई चारा नही.
उन दिनों कम से कम जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार के बीच ऐसी कोई घटना सुनने में नही आयी...ऐसा नही है की उन दिनों वहाँ कोई राम राज्य था...लेकिन जाति को लेकर महानगर में हिंसा का ये रूप आम तो बिल्कुल नही था. क्या जाति का रक्तबीज नए अड्डे तलाश रहा है ?
इतना ज़रूर लगता है की समाज की बीमारी कैंसर टी तेजी से बढ़ती जा रही है. हर रोज़ मामूली बात को लेकर रोड पर होती हिंसा, कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ती अट्टालिकाएं और उससे उपजती तमाम मुश्किलें इन बीमारियों के लक्षण हैं......जब माँ-बाप बच्चों को फक्र से कहते थे कि 'पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब ' - उस वक्त जाति व्यवस्था अपने चरम पर होती थी. उन दिनों पल्वंकर बालू (1876 -1955) जैसे महान स्पिनर को भी टी- टाइम पर बाउंड्री के बाहर आकर चाय पीना पड़ता था (रामचंद्र गुहा- अ कोर्नेर ऑफ डी फोरेन फील्ड ).
कहा जाता है की किसी समाज को पहचानना है तो कभी वहाँ के मैदानों पर चले जाएं. मैदान पर लोगों की तादाद और उनके खेलने के तरीके से आप इलाके का मोटे तौर पर अंदाजा ज़रूर लगा सकते हैं...यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया में जाति को लेकर समाज वैसा नही बँटा जैसा अफगानिस्तान, पाकिस्तान या फिर भारत में है...
लगातार खत्म होते मैदान इसकी बहुत बड़ी वजह हैं..जिस तरह से बिल्डर, नेता और ब्युरोक्रैत के गुप्त गठबंधन
की वजह से अट्टालिकाएं मैदानों का अस्तित्व खत्म कर रही हैं...समाज की कुंठा और कुरूप होकर सबके सामने कभी रोड पर, कभी मुहल्ले में तो कभी गावों में फन काढ़ती नज़र आयेगी.
मतलब ये नही है की मैदानों के बना देने से जाति व्यवस्था खत्म हो जायेगी...मगर आने वाली पीढी स्वस्थ ज़रूर होगी.. वरना हर रोज़ घटती ये घटनाएँ जिस विध्वंस की चेतावनी दे रही हैं उसकी कल्पना से ही दिल दहल जाता है. महानगरों का हर शख्स कम से कम इस बात को लेकर ज़रूर चिंतित होता है कि कहीं वो रोड-रेज का शिकार नही हो जाए. मनोवैज्ञानिक रूप से ये बीमारी का ही लक्षण है... और इन सबको लेकर कम से कम सचेत होने के अलावा और कोई चारा नही.
आईपीएल में दर्शक उपेक्षित हैं
पिछले हफ्ते मैंने बिना किसी पास के, आम दर्शकों जैसा स्टेडियम जाकर आईपीएल का एक मैच (डेल्ही डेअरडेविल्स और राजथान रौयाल्स) देखने की योजना बनाई. पहल तो मैं एक-डेढ़ घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद स्टेडियम के गेट तक पहुँच पाया. उससे पहले गाडी को पार्क करने में जो मुश्किल हुई वो अलग.
जब सुनता हूँ की आईपीएल ७०००-८००० की घरेलू लीग है...इसकी ये खूबियाँ हैं...इससे वो फायदा होगा तो ये भी लगता है... कि आम जनता का और कितना चूसा जायेगा...
४४ दिन के आईपीएल टूर्नामेंट में अब ये तय हो गया है कि जिस दिन भी मैच होगा...आम जनता, जो स्टेडियम जाकर मैच नही देखना चाहती, स्टेडियम के आस-पास से भी गुजरती हैं तो उनकी खैर नही. पिछले हफ्ते मैच देखने की वीरता करने के दौरान कम से कम दो-तीन ऐसे लोगों से मिला जो अस्पताल पहुँचने की जद्दोजहद में जुटे रहे ...लेकिन स्टेडियम जाने वालों की भीड़ उन्हें रास्ता नही दे पायी. दरअसल दोष उनका भी नही. उन्होंने टिकट के लिए पैसे खर्चे थे. इनमे से एक रोगी के परिवार से मेरी बात हुई और उनकी बेबसी देखकर गुस्से के अलावा और कुछ नही किया जा सकता था.
इन सबका उपाय है...अगर बीसीसीआई करना चाहे तो.....मेरे ख़याल से मैचों के लिए अब सभी स्टेडियम को शहर के बाहर बनाया जाना चाहिए..और स्टेडियम तक पहुँचने के लिए लक्ज़री बसें बनायी जानी चाहिए. इससे बीसीसीआई की कमाई का एक और जरिया तो बढेगा ही, आम लोगों को कोई तकलीफ नही होगी...यही नही ब्लैक टिकट और सुरक्षा को लेकर होने वाली समस्याएँ कम से कम हो जायेंगी. ऐसा कब होगा...सरकार कब मैच देखना छोड़कर इन छोटी लगानेवाली बड़ी मुश्किलों की और मुखातिब होगी, ये बड़े सवाल हैं
दरअसल बीसीसीआई अभी खेल और खेलप्रेमियों को सिर्फ़ चूसने का काम कर रही है. ....लेकिन एक कहावत है नीम्बू को इतना मत निचोरो की स्वाद कड़वा हो जाए...
जब सुनता हूँ की आईपीएल ७०००-८००० की घरेलू लीग है...इसकी ये खूबियाँ हैं...इससे वो फायदा होगा तो ये भी लगता है... कि आम जनता का और कितना चूसा जायेगा...
४४ दिन के आईपीएल टूर्नामेंट में अब ये तय हो गया है कि जिस दिन भी मैच होगा...आम जनता, जो स्टेडियम जाकर मैच नही देखना चाहती, स्टेडियम के आस-पास से भी गुजरती हैं तो उनकी खैर नही. पिछले हफ्ते मैच देखने की वीरता करने के दौरान कम से कम दो-तीन ऐसे लोगों से मिला जो अस्पताल पहुँचने की जद्दोजहद में जुटे रहे ...लेकिन स्टेडियम जाने वालों की भीड़ उन्हें रास्ता नही दे पायी. दरअसल दोष उनका भी नही. उन्होंने टिकट के लिए पैसे खर्चे थे. इनमे से एक रोगी के परिवार से मेरी बात हुई और उनकी बेबसी देखकर गुस्से के अलावा और कुछ नही किया जा सकता था.
इन सबका उपाय है...अगर बीसीसीआई करना चाहे तो.....मेरे ख़याल से मैचों के लिए अब सभी स्टेडियम को शहर के बाहर बनाया जाना चाहिए..और स्टेडियम तक पहुँचने के लिए लक्ज़री बसें बनायी जानी चाहिए. इससे बीसीसीआई की कमाई का एक और जरिया तो बढेगा ही, आम लोगों को कोई तकलीफ नही होगी...यही नही ब्लैक टिकट और सुरक्षा को लेकर होने वाली समस्याएँ कम से कम हो जायेंगी. ऐसा कब होगा...सरकार कब मैच देखना छोड़कर इन छोटी लगानेवाली बड़ी मुश्किलों की और मुखातिब होगी, ये बड़े सवाल हैं
दरअसल बीसीसीआई अभी खेल और खेलप्रेमियों को सिर्फ़ चूसने का काम कर रही है. ....लेकिन एक कहावत है नीम्बू को इतना मत निचोरो की स्वाद कड़वा हो जाए...
गए तो...पर बेडा गर्क करने के बाद...
मिथकों में आपने गुप्त खजाने पर नागों के कुंडली मारकर बैठने की कहानियाँ ज़रूर सुनी होगी. पिछले एक हफ्ते में हिन्दुस्तान के खेल में दो ऐसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव आए हैं जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं .......
हॉकी संघ बर्खास्त हुई तो गिल को जाना पडा...लेकिन उससे भी बड़ी बात रही पहले हॉकी संघ के सचिव के जोथिकुमारन और वेटलिफ्टिंग संघ के सचिव बलबीर भाटिया ने सचिव का पद छोड़कर दोनों संघों को जैसे किसी श्राप से मुक्ति दे दी है...... जोथिकुमारन १५ साल बाद और बलबीर भाटिया ने करीब एक दशक बाद ओलिम्पिक में पदक जीतने वाले खेलों का पिंड छोड़ा....
सिर्फ़ पाँच साल पहले चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट के पहले मैच में भारतीय टीम हौलैंड के ख़िलाफ़ पहले 60 मिनट तक 3-0 की बढ़त बना कर मैच पर हावी नज़र आ रही थी....लेकिन आख़िरी 7-8 मिनट में 4 गोल ठोककर हौलैंड ने भारत को आखिरकार 4-3 से हरा दिया....फिर भी टीम इंडिया ने लंबे समय बाद दुनिया के कई दिग्गज कोच को खूब प्रभावित किया...यहाँ तक की खिताब विजेता हौलैंड के कोच जूस्ट बल्लार्ट ने खुलकर कहा की भारतीय टीम उनसे बेहतर थी...उन दिनों ऑउस्त्रेलिई कोच रिक चार्ल्सवर्थ टूर्नामेंट की कमेंट्री कर रहे थे.. भारतीय टीम ने उन्हें भी अपनी प्रतिभा का कायल कर दिया था. रिक चार्ल्सवर्थ तो भारतीय खिलाड़ी तेजबीर सिंह को टूर्नामेंट का सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी कह दिया ....
आज वही चार्ल्सवर्थ जब कहते हैं..." भारत में ये आम धारणा बनी हुई है के हमारी टीम में प्रतिभाओं की कमी नही है...सिर्फ़ कुछ चीज़ें ठीक कर लेने से सब ठीक हो जायेगा...मेरे ख्याल से ये ग़लत है...भारत में संभावनाएं हैं...लेकिन ये देखना होगा की इससे ठीक करने की इच्छा और इच्छा शक्ति है या नही..."
ये सुनकर किसी भी हॉकीप्रेमी का दिल बैठ सकता है...
पूर्व हॉकी कप्तान अशोक कुमार (ध्यानचंद के पुत्र) भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं...अशोक कुमार कहते हैं के टीम में अब कोई भी स्टार खिलाड़ी नही है...अब फिर से स्टार बनाने की ज़रूरत है. दरअसल पिछले १५ साल में हॉकी की ज्यादातर खबरें विवादों के ईर्द-गिर्द ही रही हैं....ज़ाहिर है युवा खिलाड़ियों की दिलचस्पी इसमें घटी ही है...इस दौरान शाम को हॉकी स्टिक लेकर मैदान पर जानेवालों खिलाड़ियों को किसी भी शहर,गांवों, मोहल्ले में उँगलियों पर गिना जा सकता है ....
नए खेल मंत्री डॉक्टर एमएस गिल या दूसरे खेल संघ के अधिकारी कैमरे पर आकर चाहे जो बयान दें... ओलिम्पिक संघ के कई वरिष्ठ अधिकारी कैमरा ऑफ होते ही ये भी कहते हैं की आप चाहे जो कहें भारत का राष्ट्रीय खेल अब क्रिकेट है...और क्रिकेट और दूसरे खेलों में बड़ा बन गया है....
वेटलिफ्टिंग की हालत हॉकी से बहुत अलग नही है....2000 के सिडनी ओलिम्पिक खेलों में जब पहली बार महिला वेटलिफ्टिंग को शामिल किया गया....तो संघ के सचिव बलबीर भाटिया पर टीम के चयन में धांधली का आरोप लगा.... लेकिन यमुनानगर की कर्णम मल्लेस्वरी ने इकलौता पदक (69 किलोग्राम वर्ग में 240 किलोग्राम उठाकर कांस्य पदक) जीतकर...सबकी लाज बचा ली....कर्णम ओलिम्पिक खेलों में निजी पदक जीतनेवाली पहली और अकेली महिला खिलाडी बन गयीं. ... संघ के सचिव भाटिया पर लगा दाग भी कांसे की चमक में छुप गया.
चार साल बाद एथेंस में इस टीम से और उम्मीद बढ़ी. लगा वेटलिफ्टर एथेंस में कुछ और नए मुकाम ज़रूर छुएंगे.......मगर इस टीम की दो खिलाड़ी (प्रतिमा कुमारी और सानामाचा चान्हु) डोपिंग में धरी गयीं....और इसकी वज़ह से सभी भारतीय को शर्मसार होना पड़ा....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर प्रतिबन्ध तक लगा दिया गया.
उससे भी बड़े शर्म की बात ये रही की ये सिलसिला आगे भी बरकरार रहा...2006 कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान एकबार फिर भारतीय खिलाड़ी डोपिंग के दोषी पाए गए....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर अंतर्राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग संघ ने फिर प्रतिबन्ध लगाया...ऐसे में खिलाड़ियों को तो सज़ा मिली...मगर एक बार भी किसी अधिकारी पर आंच नही आयी....ख़बर है की इस बार बलबीर भाटिया भ्रष्टाचार के आरोप में घिर सकते हैं.... लेकिन उससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया है....
भारतीय वेटलिफ्टर अधिकारियों पर कई तरह के आरोप लगाते हैं.....लेकिन भारत में खेल संघ इतने ताकतवर हैं की वो अपनी शिकायत सुना नही सकते. वैसे भी क्रिकेट के इस देश में वेत्लिफ्टिंग जैसे खेल अब ज्यादातर नौकरी हासिल करने का जरिया भर रह गए हैं....धीरे-धीरे इस खेल से से मुंह मोड़नेवाले लोगों की तादाद ही नज़र आती है.... ऐसे में ये खेल कब यहाँ दम तोड़ दे आपको ख़बर भी नही होगी...
2006 दोहा एशियाड में भारतीय हॉकी टीम पहली बार पोडियम पर पहुँचने में नाकाम रही तो पाकिस्तान को कांसे से संतोष करना पडा. फ़र्ज़ कीजिये 2012 के लंदन ओलिम्पिक खेलों में भारत के साथ पाकिस्तान हॉकी टीम ओलिम्पिक में क्वालिफाई करने से चूक जाती है .....ऐसे में इस खेल का ओलिम्पिक में टिकना मुश्किल हो जायेगा....इसे ओलिम्पिक से बाहर करने को लेकर पहले भी बहस हो चुकी है....
जर्मनी (मूनशेनग्लाडबाख) में 2006 में हुए हॉकी वर्ल्ड कप के फाइनल को देखने सिर्फ़ 4000 के करीब देखने लोग इकठा हुए...मतलब साफ है इस खेल की जड़ भारत और पाकिस्तान में ही है....अगर यहाँ हालात बिगड़े गए तो एशियाड और ओलिम्पिक के साथ इस खेल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा....हॉकी और वेटलिफ्टिंग से जुड़े खिलाड़ी, फैंस और अधिकारियों के लिए खतरे की घंटी बज रही है....
मिथकों में आपने गुप्त खजाने पर नागों के कुंडली मारकर बैठने की कहानियाँ ज़रूर सुनी होगी. पिछले एक हफ्ते में हिन्दुस्तान के खेल में दो ऐसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव आए हैं जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं .......
हॉकी संघ बर्खास्त हुई तो गिल को जाना पडा...लेकिन उससे भी बड़ी बात रही पहले हॉकी संघ के सचिव के जोथिकुमारन और वेटलिफ्टिंग संघ के सचिव बलबीर भाटिया ने सचिव का पद छोड़कर दोनों संघों को जैसे किसी श्राप से मुक्ति दे दी है...... जोथिकुमारन १५ साल बाद और बलबीर भाटिया ने करीब एक दशक बाद ओलिम्पिक में पदक जीतने वाले खेलों का पिंड छोड़ा....
सिर्फ़ पाँच साल पहले चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट के पहले मैच में भारतीय टीम हौलैंड के ख़िलाफ़ पहले 60 मिनट तक 3-0 की बढ़त बना कर मैच पर हावी नज़र आ रही थी....लेकिन आख़िरी 7-8 मिनट में 4 गोल ठोककर हौलैंड ने भारत को आखिरकार 4-3 से हरा दिया....फिर भी टीम इंडिया ने लंबे समय बाद दुनिया के कई दिग्गज कोच को खूब प्रभावित किया...यहाँ तक की खिताब विजेता हौलैंड के कोच जूस्ट बल्लार्ट ने खुलकर कहा की भारतीय टीम उनसे बेहतर थी...उन दिनों ऑउस्त्रेलिई कोच रिक चार्ल्सवर्थ टूर्नामेंट की कमेंट्री कर रहे थे.. भारतीय टीम ने उन्हें भी अपनी प्रतिभा का कायल कर दिया था. रिक चार्ल्सवर्थ तो भारतीय खिलाड़ी तेजबीर सिंह को टूर्नामेंट का सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी कह दिया ....
आज वही चार्ल्सवर्थ जब कहते हैं..." भारत में ये आम धारणा बनी हुई है के हमारी टीम में प्रतिभाओं की कमी नही है...सिर्फ़ कुछ चीज़ें ठीक कर लेने से सब ठीक हो जायेगा...मेरे ख्याल से ये ग़लत है...भारत में संभावनाएं हैं...लेकिन ये देखना होगा की इससे ठीक करने की इच्छा और इच्छा शक्ति है या नही..."
ये सुनकर किसी भी हॉकीप्रेमी का दिल बैठ सकता है...
पूर्व हॉकी कप्तान अशोक कुमार (ध्यानचंद के पुत्र) भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं...अशोक कुमार कहते हैं के टीम में अब कोई भी स्टार खिलाड़ी नही है...अब फिर से स्टार बनाने की ज़रूरत है. दरअसल पिछले १५ साल में हॉकी की ज्यादातर खबरें विवादों के ईर्द-गिर्द ही रही हैं....ज़ाहिर है युवा खिलाड़ियों की दिलचस्पी इसमें घटी ही है...इस दौरान शाम को हॉकी स्टिक लेकर मैदान पर जानेवालों खिलाड़ियों को किसी भी शहर,गांवों, मोहल्ले में उँगलियों पर गिना जा सकता है ....
नए खेल मंत्री डॉक्टर एमएस गिल या दूसरे खेल संघ के अधिकारी कैमरे पर आकर चाहे जो बयान दें... ओलिम्पिक संघ के कई वरिष्ठ अधिकारी कैमरा ऑफ होते ही ये भी कहते हैं की आप चाहे जो कहें भारत का राष्ट्रीय खेल अब क्रिकेट है...और क्रिकेट और दूसरे खेलों में बड़ा बन गया है....
वेटलिफ्टिंग की हालत हॉकी से बहुत अलग नही है....2000 के सिडनी ओलिम्पिक खेलों में जब पहली बार महिला वेटलिफ्टिंग को शामिल किया गया....तो संघ के सचिव बलबीर भाटिया पर टीम के चयन में धांधली का आरोप लगा.... लेकिन यमुनानगर की कर्णम मल्लेस्वरी ने इकलौता पदक (69 किलोग्राम वर्ग में 240 किलोग्राम उठाकर कांस्य पदक) जीतकर...सबकी लाज बचा ली....कर्णम ओलिम्पिक खेलों में निजी पदक जीतनेवाली पहली और अकेली महिला खिलाडी बन गयीं. ... संघ के सचिव भाटिया पर लगा दाग भी कांसे की चमक में छुप गया.
चार साल बाद एथेंस में इस टीम से और उम्मीद बढ़ी. लगा वेटलिफ्टर एथेंस में कुछ और नए मुकाम ज़रूर छुएंगे.......मगर इस टीम की दो खिलाड़ी (प्रतिमा कुमारी और सानामाचा चान्हु) डोपिंग में धरी गयीं....और इसकी वज़ह से सभी भारतीय को शर्मसार होना पड़ा....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर प्रतिबन्ध तक लगा दिया गया.
उससे भी बड़े शर्म की बात ये रही की ये सिलसिला आगे भी बरकरार रहा...2006 कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान एकबार फिर भारतीय खिलाड़ी डोपिंग के दोषी पाए गए....भारतीय वेटलिफ्टिंग संघ पर अंतर्राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग संघ ने फिर प्रतिबन्ध लगाया...ऐसे में खिलाड़ियों को तो सज़ा मिली...मगर एक बार भी किसी अधिकारी पर आंच नही आयी....ख़बर है की इस बार बलबीर भाटिया भ्रष्टाचार के आरोप में घिर सकते हैं.... लेकिन उससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया है....
भारतीय वेटलिफ्टर अधिकारियों पर कई तरह के आरोप लगाते हैं.....लेकिन भारत में खेल संघ इतने ताकतवर हैं की वो अपनी शिकायत सुना नही सकते. वैसे भी क्रिकेट के इस देश में वेत्लिफ्टिंग जैसे खेल अब ज्यादातर नौकरी हासिल करने का जरिया भर रह गए हैं....धीरे-धीरे इस खेल से से मुंह मोड़नेवाले लोगों की तादाद ही नज़र आती है.... ऐसे में ये खेल कब यहाँ दम तोड़ दे आपको ख़बर भी नही होगी...
2006 दोहा एशियाड में भारतीय हॉकी टीम पहली बार पोडियम पर पहुँचने में नाकाम रही तो पाकिस्तान को कांसे से संतोष करना पडा. फ़र्ज़ कीजिये 2012 के लंदन ओलिम्पिक खेलों में भारत के साथ पाकिस्तान हॉकी टीम ओलिम्पिक में क्वालिफाई करने से चूक जाती है .....ऐसे में इस खेल का ओलिम्पिक में टिकना मुश्किल हो जायेगा....इसे ओलिम्पिक से बाहर करने को लेकर पहले भी बहस हो चुकी है....
जर्मनी (मूनशेनग्लाडबाख) में 2006 में हुए हॉकी वर्ल्ड कप के फाइनल को देखने सिर्फ़ 4000 के करीब देखने लोग इकठा हुए...मतलब साफ है इस खेल की जड़ भारत और पाकिस्तान में ही है....अगर यहाँ हालात बिगड़े गए तो एशियाड और ओलिम्पिक के साथ इस खेल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा....हॉकी और वेटलिफ्टिंग से जुड़े खिलाड़ी, फैंस और अधिकारियों के लिए खतरे की घंटी बज रही है....
Wednesday, April 30, 2008
थप्पड़ की गूंज
आज से दस-पन्द्रह साल पहले और उससे भी पहले जब हम मोहल्ले में क्रिकेट खेलते थे, तो समय की कमी की वज़ह से और इसलिए भी कि मैच का नतीजा निकल आए आधे दिन का मैच खेलते थे। मैच उन दिनों भी 20-20 ओवर का ही होता था। ख़ास बात यह थी कि इन मैचों में हारने वाली टीम के कप्तान को जीतने वाली टीम के स्कोर-रजिस्टर में हस्ताक्षर करना पड़ता था, लेकिन हारने वाली टीम का कप्तान अगर कद-काठी में बलवान दिखता था तो कई बार अपने रौब के ज़रिये इस प्रक्रिया से बच जाता था।
आईपीएल में पंजाब के किंग्स इलेवन और मुम्बई इंडियन की टीमों को एक भी जीत नहीं मिली थी, इसलिए दोनों ही टीमें हर हाल में जीत हासिल करने के इरादे से मैदान पर उतरीं। मैच के दौरान श्रीसंत अपने ही स्टाइल में खिलाड़ियों को छेड़ते रहे (रॉबिन उथप्पा, शॉन पोलाक और मुसाविर खोते को), लेकिन उन्हें ये मालूम नहीं था कि मैच के बाद ये उन्हें इतना महंगा पड़ेगा। फिर भी, मैच ख़त्म होने पर मुम्बई इंडियन टीम के कप्तान हरभजन सिंह ने जो कुछ किया वह बिल्कुल ख़राब मोहल्ले क्रिकेट जैसा ही वाकया लगा।
भारतीय क्रिकेट में अनिल कुंबले के बाद सबसे ज़्यादा विकेट (275 टेस्ट विकेट) झटकने वाले स्पिन गेंदबाज़ भज्जी पहले भी विवादों में पड़ते रहे हैं। इस बार भले ही श्रीसंत ने उन्हें माफ़ कर दिया हो लेकिन ये वाकया उन्हें काफी महंगा पड़ने वाला है। साल के शुरुआत में (जनवरी 2007) में सिडनी टेस्ट के दौरान एंड्र्यू साइमंड्स से उनके झगड़े के बाद टीम इंडिया, बीसीसीआई और पूरा देश उनके साथ था लेकिन इस बार वह बिल्कुल अकेले हैं और उनके पीछे उनकी काबिलियत से ज़्यादा उनका विवादास्पद इतिहास है। उनके पंजाब के साथी युवराज (विपक्षी टीम के कप्तान) भी उनसे नाराज़ हैं। हरभजन ने सफाई दी की ये उनके और श्रीसंत के बीच का मामला है जिसे कोई मनाने को तैयार नही, बीसीसीआई भी नही। बड़ी बात ये है की इन सबका असर कहीं उनके फैंस की तादाद पर ना पड़े, और शायद स्पॉन्सर पर भी।
लेकिन, सिर्फ़ इस मुद्दे को लेकर उन्हें मोगेम्बो बना देना भी जायज़ नही लगता। दरअसल ट्वेंटी-20 क्रिकेट की फितरत ही ऐसी है कि इसे नतीजे के लिए खेला जाता है। इसमें पैसे की वज़ह से खिलाड़ियों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव होता है। नतीजा (जीत) हर कीमत पर चाहिए। स्पॉन्सर, खिलाड़ी और उनके फैंस सब इसी चाह से टीम से जुड़े हैं। फिर इस खेल से जेंटिलमेन गेम की धारणा (औपनिवेशिक धारणा) अब लुप्त होती दिख रही है। क्रिकेट तीन घंटे का सिनेमा बना दिया गया है तो इसका सबसे ज़्यादा दबाव खिलाड़ियों पर बढ़ा है। अब यहां फुटबॉल मैदान जैसा जूनून दिखाई पड़ता है तो कई बार वैसी ही झड़प भी देखने को मिल जाती है। फिर ऐसा भी नहीं कि भज्जी की हरकत खेल की दुनिया की अकेली और अनूठी हरकत है।
करीब दो साल पहले 2006 वर्ल्ड कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदाने के किए गए हेड बूट (इटली के मार्को मतेरात्जी के ख़िलाफ़) को कौन भूल पाया है। उसी तरह करीब पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। खूब बखेड़ा हुआ। दुनिया भर के अखबारों में ये खबरें छाई रहीं।
खेल की दुनिया में ऐसे किस्से, विवादों के न जाने कितने उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे। क्रिकेट में भी ड्रेसिंग रूम में ऐसे कई विवाद होते हैं जो सबके सामने नही आते। क्रिकेट स्टार शोएब अख्तर की मानें तो पाकिस्तान ड्रेसिंग रूम में छुरियां तक निकल चुकी हैं। हां, इन सबको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है जो जायज़ भी है। भज्जी भी इससे बचकर नही निकल सकते। भारतीय ड्रेसिंग रूम में भी ऐसी कई घटनाएं होती रही हैं जो कभी आप तक नही पहुंच पाईं। फिर श्रीसंत को तो पूरी दुनिया ने टेलिविज़न और तस्वीरों में फफक-फफक कर रोते देखा है।
भज्जी और दूसरे क्रिकेट खिलाड़ियों को अब यह याद रखना होगा की भारतीय फैन और मीडिया क्रिकेट के साथ अब खेल से ज्यादा धर्म और जुनून की तरह व्यवहार करते हैं। इसलिए ये फैंस अब उनके क्रिकेट करियर में उन्हें इस घटना के बगैर याद नही करेंगे। खासकर तब तो बिल्कुल भी नही जब उनका प्रदर्शन मैच में ख़राब होगा।
बीसीसीआई ने भज्जी को आईपीएल से निलंबित कर साफ कर दिया है की उन्हें आसानी से मुक्ति नही मिलने वाली। अस्सी के दशक के आख़िर में सुभाष घई की एक फिल्म के खलनायक डॉ. डेंग को हीरो दिलीप कुमार एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाते हैं, तो डॉ. डेंग कहता है "इस थप्पड़ की गूंज सूनी तुमने राणा। अब तुम्हें इस गूंज की गूंज सुनाई देगी।" न्यूज़ चैनल्स और अखबारों ने ये तय कर दिया है की भज्जी जब तक क्रिकेट खेलेंगे उन्हें इस थप्पड़ की गूंज सुनाई देगी और अब उन्हें आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ) की भी पैनी निगाहों के पहरे में खेलना होगा।
आईपीएल में पंजाब के किंग्स इलेवन और मुम्बई इंडियन की टीमों को एक भी जीत नहीं मिली थी, इसलिए दोनों ही टीमें हर हाल में जीत हासिल करने के इरादे से मैदान पर उतरीं। मैच के दौरान श्रीसंत अपने ही स्टाइल में खिलाड़ियों को छेड़ते रहे (रॉबिन उथप्पा, शॉन पोलाक और मुसाविर खोते को), लेकिन उन्हें ये मालूम नहीं था कि मैच के बाद ये उन्हें इतना महंगा पड़ेगा। फिर भी, मैच ख़त्म होने पर मुम्बई इंडियन टीम के कप्तान हरभजन सिंह ने जो कुछ किया वह बिल्कुल ख़राब मोहल्ले क्रिकेट जैसा ही वाकया लगा।
भारतीय क्रिकेट में अनिल कुंबले के बाद सबसे ज़्यादा विकेट (275 टेस्ट विकेट) झटकने वाले स्पिन गेंदबाज़ भज्जी पहले भी विवादों में पड़ते रहे हैं। इस बार भले ही श्रीसंत ने उन्हें माफ़ कर दिया हो लेकिन ये वाकया उन्हें काफी महंगा पड़ने वाला है। साल के शुरुआत में (जनवरी 2007) में सिडनी टेस्ट के दौरान एंड्र्यू साइमंड्स से उनके झगड़े के बाद टीम इंडिया, बीसीसीआई और पूरा देश उनके साथ था लेकिन इस बार वह बिल्कुल अकेले हैं और उनके पीछे उनकी काबिलियत से ज़्यादा उनका विवादास्पद इतिहास है। उनके पंजाब के साथी युवराज (विपक्षी टीम के कप्तान) भी उनसे नाराज़ हैं। हरभजन ने सफाई दी की ये उनके और श्रीसंत के बीच का मामला है जिसे कोई मनाने को तैयार नही, बीसीसीआई भी नही। बड़ी बात ये है की इन सबका असर कहीं उनके फैंस की तादाद पर ना पड़े, और शायद स्पॉन्सर पर भी।
लेकिन, सिर्फ़ इस मुद्दे को लेकर उन्हें मोगेम्बो बना देना भी जायज़ नही लगता। दरअसल ट्वेंटी-20 क्रिकेट की फितरत ही ऐसी है कि इसे नतीजे के लिए खेला जाता है। इसमें पैसे की वज़ह से खिलाड़ियों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव होता है। नतीजा (जीत) हर कीमत पर चाहिए। स्पॉन्सर, खिलाड़ी और उनके फैंस सब इसी चाह से टीम से जुड़े हैं। फिर इस खेल से जेंटिलमेन गेम की धारणा (औपनिवेशिक धारणा) अब लुप्त होती दिख रही है। क्रिकेट तीन घंटे का सिनेमा बना दिया गया है तो इसका सबसे ज़्यादा दबाव खिलाड़ियों पर बढ़ा है। अब यहां फुटबॉल मैदान जैसा जूनून दिखाई पड़ता है तो कई बार वैसी ही झड़प भी देखने को मिल जाती है। फिर ऐसा भी नहीं कि भज्जी की हरकत खेल की दुनिया की अकेली और अनूठी हरकत है।
करीब दो साल पहले 2006 वर्ल्ड कप फाइनल के दौरान सुपरस्टार जिनेदिन जिदाने के किए गए हेड बूट (इटली के मार्को मतेरात्जी के ख़िलाफ़) को कौन भूल पाया है। उसी तरह करीब पांच साल पहले आर्सेनल के ख़िलाफ़ हार के बाद मैनचेस्टर युनैतेद के कोच सर अलेक्स फर्ग्युशन ने फुटबॉल ड्रेसिंग रूम में गुस्से में बूट फेंका जो सुपरस्टार खिलाडी डेविड बेकहम के सर पर लगा। खूब बखेड़ा हुआ। दुनिया भर के अखबारों में ये खबरें छाई रहीं।
खेल की दुनिया में ऐसे किस्से, विवादों के न जाने कितने उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे। क्रिकेट में भी ड्रेसिंग रूम में ऐसे कई विवाद होते हैं जो सबके सामने नही आते। क्रिकेट स्टार शोएब अख्तर की मानें तो पाकिस्तान ड्रेसिंग रूम में छुरियां तक निकल चुकी हैं। हां, इन सबको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है जो जायज़ भी है। भज्जी भी इससे बचकर नही निकल सकते। भारतीय ड्रेसिंग रूम में भी ऐसी कई घटनाएं होती रही हैं जो कभी आप तक नही पहुंच पाईं। फिर श्रीसंत को तो पूरी दुनिया ने टेलिविज़न और तस्वीरों में फफक-फफक कर रोते देखा है।
भज्जी और दूसरे क्रिकेट खिलाड़ियों को अब यह याद रखना होगा की भारतीय फैन और मीडिया क्रिकेट के साथ अब खेल से ज्यादा धर्म और जुनून की तरह व्यवहार करते हैं। इसलिए ये फैंस अब उनके क्रिकेट करियर में उन्हें इस घटना के बगैर याद नही करेंगे। खासकर तब तो बिल्कुल भी नही जब उनका प्रदर्शन मैच में ख़राब होगा।
बीसीसीआई ने भज्जी को आईपीएल से निलंबित कर साफ कर दिया है की उन्हें आसानी से मुक्ति नही मिलने वाली। अस्सी के दशक के आख़िर में सुभाष घई की एक फिल्म के खलनायक डॉ. डेंग को हीरो दिलीप कुमार एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाते हैं, तो डॉ. डेंग कहता है "इस थप्पड़ की गूंज सूनी तुमने राणा। अब तुम्हें इस गूंज की गूंज सुनाई देगी।" न्यूज़ चैनल्स और अखबारों ने ये तय कर दिया है की भज्जी जब तक क्रिकेट खेलेंगे उन्हें इस थप्पड़ की गूंज सुनाई देगी और अब उन्हें आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ) की भी पैनी निगाहों के पहरे में खेलना होगा।
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