Saturday, July 19, 2008

वेताल के सवाल

वेताल के सवाल
विमल मोहन
नई दिल्ली, शनिवार, जुलाई 12, 2008

धुन का पक्का विक्रम पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा, उसे कंधे पर डाल लिया और यथावत श्मशान की ओर बढ़ने लगा, तब शव के अन्दर के वेताल (मीडिया) ने विक्रम (रिपोर्टर) से पूछा, 'राजन मैं ये नही जानता कि किस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए तुम इस केस पर इतनी मेहनत कर रहे हो, राजेश तलवार तो जेल से रिहा हो चुके हैं, इसलिए देश की महंगाई पर भी काबू पा ही लिया गया होगा, वैसे भी समस्याओं से भरे इस देश में एक समस्या कम या ज़्यादा हो तो क्या फर्क पड़ता है। वेताल ने कहा कि अगर इन सवालों का जवाब जानते हुए भी तुम जवाब नही दोगे तो तुम्हारी टीआरपी गिरा दी जाएगी तुम्हारे सर के ख़ुद ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।

आपको नहीं लगता बचपन में, चंदामामा में पढ़ी गईं ऐसी तमाम कहानियाँ आज तमाम खबरिया चैनलों की फितरत बन गई हैं। सवाल सिर्फ़ समाज के या ख़बर प्रति संजीदगी या मानवता का ही नही है। क्या आरुषि हत्याकांड, निठारी हत्याकांड या ऐसी ही कई और दूसरी खबरों की बाल की खाल निकालने से टीवी रखे जाने वाले ड्रॉइंग रूम का माहौल बोझिल नही हो गया है? इस बीच मीडिया ने सबसे पहला स्थान हासिल करने की दौड़ में क्या कुछ खो भी दिया है, ये बहुत चिंतन का विषय है।

बचपन में माएं बच्चों को पुलिस से डराती थीं, और बड़े होकर हम दोस्तों में बात होती रही की पुलिस की ना दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी। यकीन मानिए मीडिया की हालत आज इससे बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं है। नूपुर और दुर्रानी परिवार ने जो बात मीडिया के सामने चीख-चीख कर कही (उसे गैर-ज़िम्मेदार बताया), आम लोग इससे बहुत अलग राय नहीं रखते।

राजेश तलवार जेल से रिहा होने के बाद साईं बाबा के मन्दिर पूजा करने जा रहे थे। साथ ही तस्वीरों में ये भी दिखा की एक पिता अपने दो बच्चों को कैमरों से बचाने की कोशिश कर रहा है। मैं हैरान हूं ये सोचकर की क्या मीडिया की हालत इतनी ख़राब हो गई है? क्या मीडिया पर आम लोगों के विश्वास का स्तर यहाँ तक पहुँच गया है? भारत में चौथे स्तम्भ के लिए ये अब एक ऐसा सुलगता सवाल है जो उसकी नियति भी तय करेगा?

मीडिया ये भूल गया है की वो पहरेदार भर की भूमिका निभा सकता है, न्यायलय की नहीं, वो भूल गया है की उसका दायित्व दर्पण बनकर झूठ और सच के सामने खड़े होने भर का है ताकि समाज उसके हिसाब से अपनी राय बना सके। मीडियाकर्मी या संस्थाएं आगे निकलने की आपाधापी में घटनाओं में सच और झूठ के रंग भरने की कोशिश करते हैं और इस क्रम में अपनी विश्वसनीयता खोकर समाज में इसे अस्पृश्य का दर्जा हासिल करते जा रहे हैं।

'आरुषि-मर्डर केस' का सच चाहे जो भी हो आम लोगों में इस बात की राहत ज़्यादा दिख रही है की चलो इस न्यूज़ से शायद अब छुटकारा मिला। इस देश में जहाँ चुनाव, महंगाई, सरकार बचने-गिरने की कवायद किसी तरह चैनल और अखबारों में जगह बना पाते हों (जिसका हम सबकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ने वाला है), ज़ाहिर है लोग ख़बरों की बजाय सास-बहू और राखी सावंत के टॉक-शो देखना ज़्यादा पसंद करेंगे।

मीडिया क्या बेचना या परोसना चाहती है, ये सब ज्यादातर मीडिया के एयर-कंडीशंड कमरों में तय हो जाते हैं, क्योंकि बुनियादी तौर पर रिपोर्टिंग का स्तर गिर रहा है। रिपोर्टर मैदान पर जाकर हकीकत जानने के बजाय फ़ोन पर रिपोर्टिंग की ख़बर बटोरते हैं, स्टोरी फाइल करते हैं और दिहाड़ी पूरी हो जाती है। इसलिए, किस रिपोर्टर की कितनी बड़ी शख्सियत से जान पहचान है ये मीडियाकर्मियों के बीच बातचीत का अहम् मुद्दा होता है। बुनियादी स्तर पर किस रिपोर्टर को विषयों की कितनी समझ है इसकी ज़रूरत कभी-कभी ही समझी जाती है, लेकिन वक्त आ गया है ओपिनियन-मेकर माना जाने वाला मीडिया आत्ममंथन शुरू कर दे वरना जिस समाज के सामने अपनी खबरें बेचकर वो जीविका चलाते हैं उस समाज से दरकिनार कर दिए जाएंगे।

जर्मन चिन्तक-नाटककार और कवि बेर्टोल्ट ब्रेख्त ने ये कविता 1940 के दशक में लिखी थी जिसका उन्वान था 'हॉलीवुड' जो आज भारतीय मीडिया के लिए बहुत सटीक बैठती है:

रोज़ाना रोटी कमाने की खातिर
मैं बाज़ार जाता हूं
जहाँ झूठ खरीदे जाते हैं
उम्मीद के साथ
मैं विक्रेताओं के बीच अपनी जगह बना लेता हूं ...

5 comments:

ghanshyam_astrologer said...

namaskar sir
bahut achha likha hai, par ye na bhule aap bhii iisi media ka hissa hai.
urs
gsr

राजेश रंजन / Rajesh Ranjan said...

विमल जी, बुद्धू बक्से से कुछ और यहाँ ब्लॉग से कुछ...थोड़ा सी यह शिक्षा हमारे चैनलों को भी दे दीजिए

पुनेठा said...

विमल दीपावली की शुभकामना

राजीव करूणानिधि said...

विमल साहब, खूब लिखा है पर आप ये लिखना भूल गए की मीडिया का ऐसा हाल क्यों है. कुछ अच्छे प्रभाव देखने को मिला है वही गलत सन्देश से इसके भरोसे पर ऊँगली उठती है. खैर हर चीज़ के दो पहलू होते है, क्या कीजियेगा....शुक्रिया.

धीरेन्द्र पाण्डेय said...

kaaphi sundar hai