Monday, May 5, 2008

सिकुड़ते मैदान ... जाति का बढ़ता दंस

दिल्ली के मुखर्जी नगर में जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार विद्यार्थियों के बीच हुई झड़प या हिंसा से मुझे हैरानी भी हो रही है और एक अजीब किस्म की कसमसाहट भी महसूस कर रहा हूँ.. ... हैरानी इसलिए भी है की जिस इलाके में ये घटना हुई है मैंने कभी वहाँ एक दशक से ज्यादा वक्त गुजारा है...

उन दिनों कम से कम जाति को लेकर मकान मालिक और किरायेदार के बीच ऐसी कोई घटना सुनने में नही आयी...ऐसा नही है की उन दिनों वहाँ कोई राम राज्य था...लेकिन जाति को लेकर महानगर में हिंसा का ये रूप आम तो बिल्कुल नही था. क्या जाति का रक्तबीज नए अड्डे तलाश रहा है ?

इतना ज़रूर लगता है की समाज की बीमारी कैंसर टी तेजी से बढ़ती जा रही है. हर रोज़ मामूली बात को लेकर रोड पर होती हिंसा, कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ती अट्टालिकाएं और उससे उपजती तमाम मुश्किलें इन बीमारियों के लक्षण हैं......जब माँ-बाप बच्चों को फक्र से कहते थे कि 'पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब ' - उस वक्त जाति व्यवस्था अपने चरम पर होती थी. उन दिनों पल्वंकर बालू (1876 -1955) जैसे महान स्पिनर को भी टी- टाइम पर बाउंड्री के बाहर आकर चाय पीना पड़ता था (रामचंद्र गुहा- अ कोर्नेर ऑफ डी फोरेन फील्ड ).

कहा जाता है की किसी समाज को पहचानना है तो कभी वहाँ के मैदानों पर चले जाएं. मैदान पर लोगों की तादाद और उनके खेलने के तरीके से आप इलाके का मोटे तौर पर अंदाजा ज़रूर लगा सकते हैं...यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया में जाति को लेकर समाज वैसा नही बँटा जैसा अफगानिस्तान, पाकिस्तान या फिर भारत में है...

लगातार खत्म होते मैदान इसकी बहुत बड़ी वजह हैं..जिस तरह से बिल्डर, नेता और ब्युरोक्रैत के गुप्त गठबंधन
की वजह से अट्टालिकाएं मैदानों का अस्तित्व खत्म कर रही हैं...समाज की कुंठा और कुरूप होकर सबके सामने कभी रोड पर, कभी मुहल्ले में तो कभी गावों में फन काढ़ती नज़र आयेगी.

मतलब ये नही है की मैदानों के बना देने से जाति व्यवस्था खत्म हो जायेगी...मगर आने वाली पीढी स्वस्थ ज़रूर होगी.. वरना हर रोज़ घटती ये घटनाएँ जिस विध्वंस की चेतावनी दे रही हैं उसकी कल्पना से ही दिल दहल जाता है. महानगरों का हर शख्स कम से कम इस बात को लेकर ज़रूर चिंतित होता है कि कहीं वो रोड-रेज का शिकार नही हो जाए. मनोवैज्ञानिक रूप से ये बीमारी का ही लक्षण है... और इन सबको लेकर कम से कम सचेत होने के अलावा और कोई चारा नही.

2 comments:

आलोक said...

समाज के परिपेक्ष्य में खेल का वर्णन अनोखा है। खेल चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है।

विमल मोहन said...

shukria alokjji...